Wednesday, 7 October 2015

निरंतर कोशिश का ही नाम है जीवन : समीक्षक - चेचरग्रामी मुकेश



       पत्रकारिता जगत में अपनी लेखनी से दमदार उपस्थिति दर्ज कराने वाले सुनील सौरभ की पहचान महज पत्रकार के तौर पर नहीं है, वरन संवेदनशील कवि के रूप में भी है। निश्चित तौर पर कर्म से पत्रकार, तो मन-मस्तिष्क से कवि। वैसे भी पत्रकारिता और साहित्य का सृजनहार संवेदनशील ही होता है। कोई घटना जब मन को झकझोरती है, तो अनायास ही शब्द फूट पड़ते हैं और विचार अभिव्यक्त हो  जाती हैं कागजों पर।
   
   ‘मैं सपने बुनता हँू’ सुनील सौरभ की प्रकाशित दूसरा काव्य संग्रह है। इसके पूर्व ‘अतीत की पगडंडियों पर’ प्रकाशित हो चुकी है। प्रस्तुत संग्रह के दो भाग हैं, रंग और तरंग। रंग में 33, तो तरंग में 25 कविताएँ। रंग के अन्तर्गत मुक्त छंद की कविताएँ हैं, तो तरंग में छंद और लयबद्ध कविताओं को स्थान दिया गया है।
     
 दो साहित्यिक मनीषियों यथा आचार्य विश्वनाथ सिंह एवं गोवर्द्धन प्रसाद सदय जी को समर्पित ‘मै सपने बुनता हूँ’ में है, कवि का दर्द, छटपटाहट, संकल्प और संदेश। निश्चित तौर पर यह संग्रहनीय है और कवि की कोशिश सराहनीय। चूंकि पत्रकारिता कर्म में भागमभाग है। वैसे में सधी हुई कविताओं को ढालना प्रशंसनीय है।
   
   सपना हर कोई देखता है। लेकिन, सपना का सपना बनकर रह जाना इस बात का द्योतक है कि भगीरथ प्रयास नहीं किये गये। कवि भी सपने बुनता है, लेकिन वह प्रयास करता है, सपने को साकार करने और उन्हें आकार देने का। प्रयास निष्फल हो, तो इसे सपनों का मर जाना नहीं कहेेंगे। कवि के शब्दों मेंः-
       पुनः सपने बुनने, मिटने
       और उसे साकार-आकार देने की
       निरंतर कोशिश का ही नाम है जीवन।

बिल्कुल सच है कि हम खुद में जीते हैं। खुद की कमजोरी को दूर करने के बजाये दूसरे की कमी निकालने की जुगत में लगे रहते हैं। इंसान की फितरत है टाँग खींचना। कवि ने करीब से देखी है जिंदगी को। लोगों के चाल-चलन, आहार-व्यवहार को। तभी तो वह कह उठा-

       सोच, दृष्टि लगी है सभी की,
       दूसरों के दामन-ए-चाक पर
       अपनी जिंदगी की गिरेबां पर,
       कोई झांकता नहीं,
       अपनी कमियों को
       कोई आंकता नहीं।

       दुनिया में कायम आतंकवाद, अशंाति, असहिष्णुता से कवि बेचैन है। हजारों वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने यहाँ ज्ञान का संदेश फैलाया था। कवि आशावादी है और कहता है -

       बुद्ध पुनः इस धरती पर आयेगा
       परिवार और ‘मै’ में
       सिकुड़ती मानसिकता को दूर भगा
       पूरी दुनिया को एक सूत्र में जोड़
       मानव जंजीर बनायेगा
       विश्व-बंधुत्व का पाठ पढ़ायेगा।

       यह सच है कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। वेद पुराण, उपनिषद भी यह मानता है कि जीवन परिवर्तनशील है। लेकिन, आज परिवर्तन के मतलब बदल गए। इंसान मतलबी बन गया और सिमट गया खुद में। इसी को वह परिवर्तन मान बैठा है। कवि अगाह करता है कि यह परिवर्तन प्रकृति के विपरीत है और विपरीत जाने से तमाम तरह की परेशानी झेलनी पड़ेगी। तभी तो कवि कहता है-

              चलो।
       जीवन को प्रकृति के साथ जिएं।

       हम तरक्की कर रहे हैं। चाँद और मंगल तक हम पहुँच गए। लेकिन, भाग-दौड़ की जिंदगी में मानव पशु समान हो गया है। हमसे तो अच्छे पशु-पंक्षी है, जिनमें कटते जंगल और बिखरते घोंसले के बीच सामूहिकता-सामाजिकता का बोध है। पर, हम जंगली हो रहे हैं। जाति-धर्म में बँट गए हैं। कवि की चाहत है-
       जाति, धर्म, वर्ग से
       ऊपर उठो
       मानव बनो-मानव।
       मानवता के लिए
       मानव बनो।
       दुनिया तुम्हें याद करेगी
       अन्यथा जीवन निरर्थक है।
       असत्य है़! अस्तित्वविहीन!!

       निश्चित तौर पर कवि को किसी अभिन्न मित्र ने धोखा दिया होगा। तभी तो मित्र नीति के माध्यम से उन्होंने अपने दिल की बात रखी। सचमुच, छल-प्रपंच सेे प्राप्त की गयी कोई चीज स्थायी रह ही नहीं सकती। कवि का मानना है-

       धोखा देने, छल करने का बदला,
       व्यक्ति नहीं समय लेता है।

       कवि की ख्वाहिश भी है और चेतावनी भी। महापुरुषों ने खून-पसीना एक कर समाज की संरचना की। त्याग और परिश्रम का प्रतिफल है यह संुदर समाज। कवि स्पष्ट कहता है कि मानवीय संवेदनाओं को जीवित रखने वालों के लिए वो संजीवनी बनेंगे, लेकिन

       जिस दिन
       मुझे, लेशमात्र भी
       यह एहसास हो जायेगा कि-
       तुम्हारी भावनाएं समाज को विखंडित करने की ओर बढ़ रही है,
       तुम्हारी भावनाओं को
       तोड़-मरोड़ कर रख दूंगा!
       यह मेरा दृढ़ संकल्प है।
अर्थहीन होते जीवन एवं रोज-ब-रोज की समस्याओं से मानव मन परेशान है। मानव की चाहत का अंत नहीं। वह करोड़पति बनना चाहता है रातों-रात, जिंदगी को तोड़ता है, मरोड़ता है। अपने सिद्धांत और अपनी परंपरा को तिलांजलि दे देता है। कवि संदेश देता है-

       आओ! सीेखे कलरव करते
       आसमान में विचरते-उड़ते पंक्षियों से।
       मूक रहकर गरल पीने वाले
       जीवनदायी वृक्षों से।
कवि मुक्तहस्तक है। उसने तो अपनी खुशियों को तिलांजलि दे दी। मसलन, इसलिए कि ‘वो’ खुश रहे। कवि की चाहत है कि जिसके लिए उसने खुशियों को छोड़ा, वो नए अनुभव को प्राप्त करे, खुश रहे। वह तो स्पष्ट कहता है मेरी भावनाओं का कद्र करना तुम्हारे हाथांे में है, क्योंकि भावनाएँ घायल हुई तो खुशियाँ भी पल भर का मेहमान बन कर रह जायेगी।
       मैं चाहता हॅूं
       मेरी भावनाएं भी आहत न हो
       और
       तुम भी खुश रहो
       सदा खुश रहो।

       कवि का तो यह मानना है कि अपनी खुशियों के साथ दूसरों को खुशियाँ देना ही जीवन जीने का सच्चा मकसद है। बिल्कुल सत्य कथन है कि ‘हम’ और ‘हमारे’ में सिमटे लोगों को तो समाज भी याद नहीं करना चाहता है। कवि विषाक्त वातावरण से अलग अतीत में लौटना चाहता है। जहाँ लोगों के बीच प्यार ही प्यार हो, माटी की सोंधी महक हो और जिसके अन्तः कलश में भरा हो- भाईचारा, विश्व बंधुत्व, राष्ट्रप्रेम, अनेकता में एकता। वत्र्तमान की कसौटी और भविष्य का आईना अतीत ही है। स्वर्णिम अतीत से इतर आज सच्चाई, ईमानदारी और मानवता का कोई मोल नहीं रह गया। कवि वत्र्तमान से दुखी है और कहता है,

       समाज को तोड़ने का
       जहर धधक रहा है
       वत्र्तमान के आगोश में।

आम आदमी क्या कष्ट झेलता है, कवि को इसका इल्म है। पत्रकारिता मेें कवि का एक लंबा कार्यानुभव रहा है। लाजिमी है आज आदमी से सीधा वास्ता कवि को है। मूसलधार बारिश, सूरज की तपिश और शीत काल की ठंडक सब कुछ आम आदमी ही सहता है। एक गंभीर पंक्ति

       मैं आम आदमी हँूं।
       मेरे लिए कहीं कुछ
       ‘खास’ नहीं।

कवि उदास है। समाज की अभिशप्त परंपरा, आधुनिकीकरण, सामाजिक विदू्रपता ने कवि को बेचैन कर रखा है। वह उदास इसलिए है कि उसका सुनने वाला कोई नहीं है। पश्चिमी संगीत पर थिरकना उसे पंसद नहीं। उसे ऐश्वर्य नहीं चाहिए। धन दौलत भी उसे प्यारा नहीं। वह तो मन को ज्ञान से भरने की अभ्यर्चना माँ शारदे से करता है और ज्ञान से दुनिया को रोशन करने की चाह रखता है। उसकी ख्वाहिश उन्हीं के शब्दों में-

       मुझे! रहने दो अपने गांव की छांव में
       माटी की सोंधी गंध मेें।

फाल्गुन और सावन बहुत कष्टकारी होता है। उनके लिए जिनके पिया परदेश में कमाने गए हैं। उदास प्रियतम पिया की राह तकती है। आधुनिक काल में भी कवि चिट्ठी की बात करता है-
       आज देहरी पर दस्तक दे गयी फागुनी बयार
       चिट्ठी न पाती, कब आयेंगे पिया, कब खिलेगी बहार
आगे-
     
       बैठी हूंूँ प्रिय अपने द्वार लगाये तेरी आस
       कहीं बीत न जाये तेरे बिन यह मधुमास।

हम आज कहाँ आ गए? यारों की महफिल में भी सारे बेगाने हैं। रिश्तों पर हावी हो गया है अर्थ! संबंध का दायरा सिमट गया है। और लोग खुद में सिमट गए हैं। ऐसे में कवि का यह कहना सोचने को विवश करता है कि-
     
       ऐसे तो पहचानते नहीं, किसी को कभी वक्त पर लोग,
       लेकिन घिरी घटा क्या? रिश्ता जतलाने लगे हैं लोग।

कवि आशावादी है, ताीभ्ज्ञभी तो वह कह उठा

       मेरी कांटों भरी राहों में भी आज रोशनी है
       शायद कोई मेरे लिए ज्योति जलायी होगी।

जिंदगी का हर पल कांटो भरा डगर है और जीवन एक अनजाना सा सफर है। सफर के रास्ते भी टेढ़े-मेढ़े। अगले कदम को कांटे मिलेंगे या फूल, पता नहीं। ऐसे में जख्म पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं। चेहरे के अंदर भी चेहरा छिपा है। कवि कह डालता है-

       हर चेहरे पर लिपटा है कई चेहरे
       तभी तो कोंई भी सूरत अब लुभाती नहीं।

कवि की इच्छा है कि संसार से राग-द्वेष मिट जाये। हर कोई शान से जिए। न राह में नफरत रोड़े अटकाये न द्वेष कांटा बन जाए। कवि का संदेश है

       हर किसी को अपना बनाओ
       हम भी जियें तुम भी जियो
       आओ, जीने का चलन चलाओ।

कुल मिलाकर, कवि को इस काव्य कृति के लिए ढेरों बधाई। किताब का आवरण बेहद मनमोहक है। मुद्रण भी त्रुटिरहित है। कवि को उज्ज्वल भविष्य की कामना! यह शुभकामना भी कि वे इसी तरह से अपनी लेखनी से समाज और देश को नई राह दिखलाते रहें।

       
समीक्षक      :      चेचरग्रामी मुकेश

कृति         :      मैं सपने बुनता हूँ
कृतिकार      :      सुनील सौरभ

प्रकाशक      :      सारस्वत प्रकाशन
                     राजेन्द्रपुरी, मुजफ्फरपुर
पृष्ठः   80     मूल्य: 125/-


2 comments:

  1. सुंदर समीक्षा ।

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  2. सुंदर समीक्षा ।

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