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Thursday, 1 October 2015

समाज की गतिविधियों का सूक्ष्म निरीक्षण:अनुगुंजन




कविता एक ऐसी विधा है जो भारतीय चित्त में ही नहीं, वरन समस्त विश्व में मानव मात्र के हदय में रची-बसी है। कोई लिखता है कोई पढ़ता है या सुनता है। कविता में आये प्रसंग स्वतः पवित्र हो जाते हैं। माना जाता था कि इसे सब नहीं रच सकते। यह प्रसाद है मां सरस्वती का। महाकवि वंदना करते थे, वीणापाणि, वाणी की देवी सरस्वती की। याचना करते थे कृपा की। कहते थे–माँ कंठ में विराजो ताकि कविता बन सके। जब से कविता लिखित हुई तब से प्रायः स्मृति से बाहर होती जा रही है। अन्यथा वह स्मृति में बनी रहती थी। मध्ययुगीन सन्तों की वाणी, जो आज भी भजनों में गाई जाती है, सदियों तक लिपिबद्ध नहीं थी।

‘‘प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ की पुस्तक ‘‘अनुगुंजन’’ की रचनाओं की पांडुलिपि मैंने पढ़ी है। उनकी अन्य कृतियाँ ‘‘ईशाराधन’’ और ‘‘वतन को नमन’’ पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं।’’ मेघदूत’ का हिन्दी में काव्यानुवाद उन पुस्तकों से भी पहले प्रकाशित हुआ था। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं तथा ‘आकाशवाणी’ से प्रसारण के माध्यम से उसकी रचनायें जन-जन तक पहुंचती रहती हैं। इस प्रकार एक प्रतिष्ठित कवि के रूप में विदग्ध जी ने अपनी उपस्थिति साहित्य जगत में दर्ज करा ली है। वे मनोयोग से कविता पढ़ने-लिखने में रमते हैं। अनुभवी हैं इसीलिये वे सरस तथा गेय कविताओं के पक्षधर व योग्य रचयिता हैं। समाज की गतिविधियों का वे सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, उनके अन्तर्विरोधों तथा विसंगतियों को समझते हैं, विडम्बनाओं को रेखांकित करते हैं, फिर वास्तविकताओं का विश्लेषण कर सरल सुबोध शब्दों में भावमय गीतात्मक कवितायें लिखते हैं।

वे सामाजिक अराजकता के विरोधी हैं–यह अराजकता जीवन में हो या साहित्य-सृजन के क्षेत्र में। उनकी कविताओं में सरलता सरसता, गेयता तथा दिशा-बोध बहुत साफ दिखाई देते हैं। विचारों की दृढ़ता तथा भावों की स्पष्टता के लिये उदाहरण स्वरूप इस कृति से निम्नलिखित पंक्तियां प्रस्तुत की जा सकती हैं–:

मंजिल कोई दूर नहीं है, चलने का अभ्यास चाहिये।
दूरी स्वयं सिमट जाती है, मन का दृढ़ विश्वास चाहिये।
*
हर अंधेरे में कहीं सोई उजाले की किरण है–
तपन के ही बाद होता चाँदनी का आगमन है।
*
यहाँ महावीर, शंकर, बुद्ध, नानक, गांधी से आये
मोहम्मद ईसा ने भी है सिखाया सब कि हैं भाई।
मगर उठती दीवारों के न टूटे आज तक घेरे
बनी दीवारों की हर रोज बढ़ती दिखती ऊंचाई।।
*
स्वार्थ और सामाजिक हित के बीच न पट पाई जो खाई
दुनियाँ और विपन्न बनेगी, प्रगति और होगी दुखदायी।
*

वे देशप्रेम की कविताओं के अप्रतिम मधुर स्वर-साधक हैं–उनकी ‘वतन को नमन’ पुस्तक देशानुराग की कविताओं से भरी पड़ी है–इस पुस्तक में भी कई उदाहरण है, जैसे–:

धरा पै स्वर्ग अवतरित हो, विश्व में सुधार हो–
मनुष्य में मनुष्य के लिये असीम प्यार हो।।
*
आदमी की समस्या स्वतः आदमी है, वही प्रश्न वह ही समाधान भी
किंतु अभिमान औ’ दृष्टि-संकीर्णता रही बाधक सदा विश्व कल्याण की।
*
गांधी के आदर्शों का यदि राम-राज्य सच लाना है।
तो उनका बस नाम नहीं, आदर्श हमें अपनाना है।।
रहें देश में सब हिल-मिलकर कोई न दुख का मारा हो
समता सद्भाव, सफल तब प्रजातंत्र का नारा हो।।
*
बंध गये मन प्राण सब इस देश के स्वर ताल लय से।
*

लगता है देशानुराग शायद उनके मन की सबसे अधिक प्रिय भावना है और आशावाद उनका विश्वस्थ साथी।
किन्तु माधुर्य भाव की कविताओं के सृजन में भी वे समान रूप से सिद्ध-हस्त दिखते हैं। उनकी अभिव्यक्ति वहाँ भी अनुपम मधुर एवं मोहक है।
उदाहरण स्वरूप ये देखें–

आज पाती तुम्हारी है जबसे मिली,
सच बहुत याद तुम प्राण आने लगे।
मन मधुर गीत खुद गुनगुनाने लगा,
नयन सपने सुहाने सजाने लगे।।
*
हवायें बदलियँ बूँदे, ये मौसम सब चले आये
न आये एक तो तुम, बदहाल हम प्रियतम चले आओ।
*
दिन कटे काम की व्यस्तता में, रात गिनते गगन के सितारे
साँस के पालने में झुलाये, आश-डोरी पै सपने तुम्हारे।
है कसम तुम्हें अपने वचन की राह में प्रिय भटक तुम न जाना।।
*
अचानक हो गई बीते दिनों से फिर मुलाकातें
तुम्हारे प्यार की ले फिर फुहारें आई बरसातें।।
*
हृदय मंदिर में बसी हैं सुहानी मूरत तुम्हारी
और फैली सब तरफ है मधुर मोहक गंध प्यारी।।
*
तुमसे मिलकर जिंदगी इतनी सुहानी हो गई
सारी मायूसी तुम्हें पा पानी-पानी हो गई।।
*
लू-लपट से निकले मिल हम साथ अब भी याद हैं
जिंदगी खुशबू से भर कर रात रानी हो गई।।
*

इस प्रकार सभी रचनायें आकर्षक पठनीय तथा गेय हैं। निष्ठा एवं उल्लास का भाव उनकी रचनाओं में गहराई से समाया हुआ है तथा जीवन के स्पंदन की मुस्कुराहट परिलक्षित होती है। लगता है कविता लेखन में उन्हें आत्म-सुख मिलता है। जीवन के समग्र परिवेश से उन्होंने अपनी रचनाओं के कथ्य चुने हैं और गंभीरता से मानवीय भावनाओं को समादृत कर सुंदर शब्दचित्र रचे हैं, जो हर भावुक हृदय को आनंदित करते हैं और अपनी छाप छोड़ जाते हैं। इन गीतों को पुस्तकाकार-प्रकाशन के अतिरिक्त आडियो-वीडियो मीडिया के द्वारा भी प्रस्तुत किया जाना उचित होगा।
मैं ‘विदग्ध’ जी की दीर्घ काव्य साधना के प्रति आस्थावान हूँ और आशावान भी। विश्वास है कि वे निरंतर सृजनशील रहेंगे।


समीक्षा डा.    : कमला प्रसाद 

कविता संग्रह : अनुनगुंज/Anugunjan
लेखक           :सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध 
पृष्ठ :  137
मूल्य :  १५० रु.  
प्रकाशक :  विकास प्रकाशन
आईएसबीएन :  81-87727-17-9