Monday, 6 June 2016

व्यावहारिक निर्देशिका पटकथा लेखन : एक जरूरी किताब :- मनोज कुमार झा

   हिंदी के महत्त्वपूर्ण कथाकार और 'जिसने लाहौर नहीं वेख्या वो जनम्या ही नहीं' जैसे विख्यात नाटक के रचनाकार असग़र वजाहत की 'व्यावहारिक निर्देशिका पटकथा लेखन' नये और उभरते हुए पटकथा लेखकों के लिए एक बहुत ही जरूरी किताब है।
हिंदी में पटकथा लेखन पर पुस्तकों का अभाव है और खासकर वैसी पुस्तक का जो असग़र वजाहत साहब ने लिखी है। पटकथा लेखन पर यह एक अनिवार्य टेक्स्ट बुक है।
इस किताब के नाम से ही जाहिर है कि यह यह पटकथा लेखन की तकनीक की जानकारी देने वाली है। पहले ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि 'पुस्तक का उद्देश्य है कि इसके माध्यम से पटकथा-लेखन की तकनीक सीखी जा सके।' यही कारण है कि इस किताब में सिनेमा के इतिहास, सैद्धांतिक पक्ष और फिल्म समीक्षा आदि पर चर्चा नहीं की गई है, बल्कि क्रम से पटकथा लेखन के हर पहलू का विश्लेषण किया गया है। पटकथा, कहानी, कहानी के विविध प्रकार, पटकथा के लिए उपयुक्त कहानी, संवाद, संवाद की भाषा, उसके अनेकानेक रूपों आदि पहलुओं की संक्षिप्त, पर ठोस जानकारी दी गई है। हर अध्याय में में संबंधित विषय-वस्तु की प्रमुख बातों को हाइलाइट कर दिया गया है, ताकि पाठक सूत्र रूप में मूल परिभाषाओं को हृदयंगम कर सकें।
प्रोफेसर असग़र वजाहत दशकों से फिल्मों में सक्रिय हैं। उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण फिल्मों और टीवी सीरियल्स के लिए कहानी, पटकथा और संवाद लिखे हैं। प्रख्यात फिल्मकार मुज़फ्फर अली की 'गमन' की कहानी, उनकी दूसरी फिल्म 'आगमन' के संवाद लिखने के अलावा 1979 में उन्होंने 'ग़ज़ल की कहानी' नामक डाक्युमेंट्री फिल्म बनाई थी। 1982-83 में 'बूंद-बूंद' सीरियल के लिए कहानी, स्क्रिप्ट और डायलॉग लिखा। प्रोफेसर वजाहत ने सुभाष घई और विनय शुक्ला जैसे दिग्गज निर्देशकों के लिए भी लेखन किया है। उन्होंने राजकुमार संतोषी की फिल्म के लिए पटकथा लिख रहे हैं, जो उनके नाटक '...लाहौर नहीं वेख्या' पर आधारित है। असग़र वजाहत फिल्म विधा के अधिकारी विद्वान हैं और लगातार पटकथा लेखन कार्यशालाओं का आयोजन करते रहते हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहने के बाद जामिया के ही मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर रह चुके हैं। साथ ही, यूरोप के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाया भी है।
इस किताब में पटकथा लेखन के विविध पहलुओं को संक्षिप्त, लेकिन वैज्ञानिक तरीके से सोदाहरण समझाया गया है।
कहानी, कहानी का विकास, कहानी के विविध प्रकार, कहानी में उपकथाएं, कहानी के पात्र, पात्रों के रूप, पात्रों के चरित्र-चित्रण के विविध माध्यम, संवाद और पात्रों के नामकरण पर संक्षिप्त, लेकिन सारगर्भित जानकारी दी गई है।
संवादों की भाषा, संवादों के प्रकार, संवादों के माध्यम से पात्रों का चरित्र-चित्रण, संवादों में प्रतीक, बिंब, मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रयोग आदि के बारे में उदाहरण के साथ बताया गया है। साथ ही, आंगिक भाषा (बॉडी लैंग्वेज) के बारे में विशेष उल्लेख किया गया है, जिसके बिना अभिनय को पूर्णता नहीं मिल सकती। आंगिक भाषा का महत्त्व एक्टिंग में सबसे ज्यादा है।
पुस्तक में कैसे किसी कहानी को स्क्रीन-प्ले में बदला जाता है, इसे सीन-दर-सीन लिख कर अच्छी तरह समझाया गया है।
सिनेमा की भाषा पर अलग से अध्याय है, जिसमें फिल्मांकन से संबंधित तमाम तकनीकी जानकारी दी गई है। इनडोर शूटिंग. आउटडोर शूटिंग, कैमरे का अलग-अलग तरीके से इस्तेमाल, शॉट्स के विविध रूपों और उनके लिए इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकी शब्दावली के बारे में पूरी जानकारी दी गई है।
डाक्युमेंट्री फिल्मों के लिए लेखन पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है। लेखक ने डाक्युमेंट्री फिल्मों के इतिहास, डाक्युमेंट्री के स्वरूप और डाक्युमेंट्री निर्माण की पूरी प्रक्रिया को क्रमबद्ध तरीके से समझाया है।
साथ ही, डाक्युड्रामा लेखन के बारे में ठोस सारगर्भित जानकारी दी है। आज टीवी पर डाक्युड्रामा का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। न्यूज स्टोरी को डाक्युड्रामा के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ रही है, क्योंकि ऑडियंस पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, डाक्युड्रामा पर जो विशेष जानकारी लेखक ने दी है, उसकी उपादेयता स्वयंसिद्ध है।
लेखक का मानना है कि एक अच्छे पटकथा लेखक के लिए सिनेमा के सभी पहलुओं की अवधारणात्मक और तकनीकी जानकारी होना जरूरी है। पटकथाकार को एक्टिंग की भी अच्छी समझ होनी चाहिए।
सिनेमा अभिव्यक्ति के सबसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरा है और लगातार इसका प्रभाव एवं प्रसार व्यापक होता जा रहा है। भारत में एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के विकास की दर बहुत तेज है। फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स) के अनुसार हिंदी सिनेमा 30 बिलियन डॉलर का उद्योग हो चुका है। भारत में हॉलीवुड से भी ज्यादा फिल्में बनती हैं और दर्शकों की संख्या भी लगातार बढ़ती ही जा रही है। भारतीय फिल्मों का एक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार भी विकसित हुआ है। ऐसे में, फिल्म उद्योग में अपार संभावनाएं हैं। चूंकि फिल्म निर्माण का आधार ही पटकथा होती है, इसलिए पटकथाकारों की मांग बढ़ना स्वाभाविक है।
फिल्म की सफलता अच्छी पटकथा पर ही आधारित होती है। यह देखा गया है कि अच्छे सब्जेक्ट्स पर बनाई गई फिल्में भी पटकथा कमजोर होने के कारण पिट गईं।
एक अच्छा पटकथाकार वही हो सकता है, जिसे फिल्म विधा की गहरी समझ तो हो ही, साथ ही अन्य कला माध्यमों की भी जानकारी हो। यह ठीक है कि पटकथा लेखन एक तकनीक है, पर यह क्रिएटिविटी से भी जुड़ा है। यह जरूरी नहीं कि एक क्रिएटिव राइटर अच्छा पटकथा लेखक भी हो, पर सफल पटकथा लेखक के लिए क्रिएटिव होना जरूरी है। किताब में लेखक ने यह इशारा किया है।
कुल मिला कर, यह किताब पटकथा लेखन के क्षेत्र में मील का पत्थर है और सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत ही जरूरी है। पटकथा लेखन पर यह सारगर्भित किताब हर जागरूक और इस क्षेत्र में हाथ आजमाने वाले लेखक को अवश्य पढ़नी चाहिए।

समीक्षक  -    मनोज कुमार झा                        
व्यावहारिक निर्देशिका पटकथा लेखन
असग़र वजाहत
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011

मूल्य : 250 रुपए

Friday, 3 June 2016

कविता में इतिहास की गत्यात्मकता - वीणा भाटिया

सरला माहेश्वरी की कविताएं पहले से पाठकों के सामने आती रही हैं, पर संग्रह के रूप में पहली बार उनकी कविताएं आई हैं। ये नये तेवर की कविताएं हैं। हिन्दी कविता में यह एक नया स्वर है, जो वास्तव में आम जन के जीवन-संघर्षों की ज़मीन से जुड़ा है। इन कविताओं को पढ़ना अनुभव और अनुभूति के एक ऐसे संसार से गुज़रना है, जहां जीवन का संघर्ष अपने उद्दाम वेग से निरन्तर जारी रहता है। सरला माहेश्वरी की कविताओं का मूल स्वर राजनीतिक है। इसकी एक वजह ये है कि राजनीति से उनका सक्रिय जुड़ाव रहा है और साथ ही कविता उन्हें विरासत में मिली है। सरला जी कहती हैं, "कविता मेरी अभिव्यक्ति की प्रमुख विधा बनेगी, ऐसा कभी सोचा नहीं था। शब्दों की इस चारु-कला के प्रति हमेशा से गहरा आकर्षण तो था, पिता (हरीश भादानी) के गाते हुए शब्दों में रमती भी थी।" कविता के प्रति इसी आकर्षण ने उन्हें राजनीति से अलग अभिव्यक्ति के इस सूक्ष्म माध्यम से जोड़ा और कुछ ही समय में उन्होंने हिन्दी काव्य जगत में दमदार उपस्थिति दर्ज की।

हिन्दी कविता में राजनीतिक विषयों पर काफी लिखा गया है। एक दौर था जब हर कवि राजनीति पर लिखना अपना धर्म मानता था। लेकिन कुछ कवियों को छोड़ दें तो हिन्दी में राजनीतिक कविता के प्रति पाठकों का आकर्षण कम होता चला गया, क्योंकि ज्यादातर कविताएं राजनीतिक नारेबाजी बन कर रह गईं। सरला जी की कविताओं में कहीं भी नारेबाजी जैसी बात नहीं है, बल्कि उस यथार्थ का उद्घाटन है जो रोज़-ब-रोज़ की हमारी ज़िन्दगी में शामिल है, फिर भी हम उसे समझ नहीं पाते। सरला जी की कविताओं में वह यथार्थ परत-दर-परत इस रूप में खुल कर सामने आता है कि जटिल अंतर्जाल में भी हम उसकी बारीक रेखाओं को आसानी से देख लेते हैं। 'कार्ल मार्क्स के 198वें जन्मदिवस पर', 'नारायण काँबले', 'मन की बात', 'स्टिंग', 'अक्सर ऐसा ही होता है', 'है कोई जवाब', 'कश्मीर', 'नेता : 'समाधिस्थ'', 'रेहाना जेब्बारी', 'हत्यारे' आदि ऐसी ही कविताएं हैं, जिनमें राजनीतिक अर्थबोध की कई परतें हैं। उनमें यथार्थ जटिल और संगुंफित है। 'हत्यारे' कविता पर विमल वर्मा ने बिल्कुल सही लिखा है - "सरला माहेश्वरी ने कविता के माध्यम से 'सफेदपोश हत्यारों' यानी पूंजीवादी व्यवहार जगत के विशिष्ट एजेंटों के वर्ग चरित्र को उद्घाटित किया है कि कैसे ये वस्तु के, यथार्थ के वास्तविक चरित्र को छिपाते हुए उसे विलोम रूप में आभासित करते हैं...काव्यात्मक संरचना में प्रतिरोध, संघर्ष, नवनिर्माण का आविर्भाव इतिहास की गत्यात्मकता से हमें जोड़ता है।" इतिहास की गत्यात्मकता से यह जुड़ाव सरला जी की हर कविता में दिखाई पड़ता है जो उनके रचना-कर्म को विशिष्ट बनाता है।

संग्रह में कई कविताएं व्यक्तियों पर लिखी गई हैं। 'लेसली उडविन', 'मुक्तिबोध', 'राजेन्द्र धोंदू भोंसले', 'प्रेमचंद', 'बी.टी.आर.', 'तुम अग्निबीज (डिरोजियो की याद में)', 'देवीराम', 'बुलिया काका' ऐसी ही कविताएं हैं। प्रसिद्ध लोगों के साथ साधारण लोग पर कविताएं लिख कर सरला जी ने जीवन की बड़ी विडम्बनाओं को सामने लाया है। सरला जी की कविताओं में व्यंग्य के तल्ख़ स्वर भी हैं। 'हठवाणी' ऐसी ही कविता है। इस कविता को पढ़ने के बाद बाबा नागार्जुन की याद आ जाना स्वाभाविक है। इस कविता का मारक व्यंग्य तिलमिला कर रख देने वाला है।
  अडवाणी जी! अडवाणी जी!
  कैसी यह हठवाणी जी
  बाहर लटका, भीतर खटका
  उठा धर्म को पटका जी।
  ईटों को पूजा, नोटों को सटका
  दिया राम को झटका जी।
ऐसी कविताएं आज के दौर में कम ही लिखी गई हैं। सिर्फ यही नहीं, संग्रह में ऐसी कई कविताएं हैं, जिनमें लोक तत्व प्रमुखता से उभर कर सामने आता है। सरला जी का जुड़ाव हमेशा जनसंघर्षों से रहा है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में उस सच का बयान है, जो उन कवियों में नहीं मिलता जो ड्राइंगरूम में बैठकर कविता रचते नहीं, बल्कि गढ़ते हैं। हिन्दी कविता में जुमलेबाजी का एक लम्बा दौर रहा है और राजनीतिक कविता के नाम पर जुमलेबाजी चलती रही है। सरला जी की कविताएं सहज और सम्प्रेषणीय हैं तो सिर्फ इसलिए कि उनमें कहीं कोई राजनीतिक जुमला नहीं, बल्कि यथार्थ है।

सरला जी की कविताओं में नारी-मुक्ति के नये स्वर भी मिलते हैं। 'सेवया की औरतें', 'इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ', 'एक अकेली औरत का होना', 'तस्लीमा नसरीन की आत्मकथा...', 'औरतें' ऐसी ही कविताएं हैं, जो स्त्री-जीवन की विडम्बना को सामने लाते हुए उनकी मुक्ति का आकांक्षा को नये स्वर देती हैं।

संकलन में कुल 90 कविताएं हैं। बार-बार पढ़ने के लिए ये कविताएं पाठक को मजबूर कर देंगी। ज्यादातर कविताएं लयात्मक हैं। एक आंतरिक लयात्मकता हर कविता में मौजूद है, जो इसे लोक से जोड़ती है। इन कविताओं का प्रकाश में आना हिन्दी साहित्य में एक सुखद घटना है। संकलन की भूमिका में उद्भ्रांत ने सच लिखा है - "आसमान के घर की खुली खिड़कियाँ के माध्यम से कवयित्री ने हिन्दी काव्य जगत के द्वार पर प्रभावी दस्तक दी है। यह संग्रह इसलिए भी अलग से पहचाना जाएगा, क्योंकि इसमें कवयित्री ने समसामयिक सामाजिक-आर्थिक इतिहास को रच दिया है, जहां दलित-शोषित-प्रताड़ित के प्रति पक्षधरता है, स्त्री विमर्श है और इस सबको काव्य के सांचे में ढालने वाली लयात्मकता है।" निश्चय ही, यह संकलन काव्य-प्रेमियों के साथ-साथ आम पाठकों के बीच भी अपनी जगह बनाएगा।

समीक्षक -    वीणा भाटिया
पुस्तक - आसमान के घर की खुली खिड़कियाँ (कविता संकलन)
प्रकाशक - सू्र्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
मूल्य - 300 रुपए
प्रकाशन वर्ष – 2015
.........................................................................................................................

Mobile no. 9013510023

Tuesday, 31 May 2016

​वेश्या एविलन रो का उपाख्यान: ब्रेख़्त की कविताएँ - भारत कालरा


वेश्या एविलन रो ब्रतोल्त ब्रेख़्त की एक प्रसिद्ध कविता है। दरअसल, यह एक उपाख्यान है। इस काव्यात्मक उपाख्यान में स्त्री की पीड़ा उसकी मुक्ति की आकांक्षा के स्वरों में सामने आती है। वेश्या एविलन रो’ पुस्तक में ब्रतोल्त ब्रेख़्त की 20 कविताएँ हैं। ब्रेख़्त की कविताओं और उनके नाटकों का हिन्दी में काफी अनुवाद हुआ है। ब्रेख़्त एक ऐसे कवि हैं जिनसे हिन्दी लेखकों-कवियों की कई पीढ़ियाँ बेहद लगाव महसूस करती रही हैं और उनसे रचनात्मक ऊर्जा हासिल करती रही हैं। लेकिन आम पाठकों तक ब्रेख़्त की कविताएँ कम ही पहुँच पाई हैं। इस संग्रह के आने से यह उम्मीद बँधी है कि ब्रेख़्त की कविताएँ आम पाठकों तक पहुँच सकेंगी और युवा पीढ़ी इन कविताओं से परिचित हो सकेगी।
ब्रेख़्त की कविताओंकहानियों और नाटकों का दुनिया भर की भाषाओं में अनुवाद हो चुका है।  हिन्दी के पाठकों के लिए विजेंद्र , अरुण माहेश्वरी, नीलाभ, सुरेश सलिल,  मोहन थपलियाल, उज्ज्वल भट्टाचार्य  जैसे साहित्यकारों ने  ब्रेख्त की कविताओं और कहानियों के अनुवाद किए हैंगुलज़ार ने भी ब्रेख्त के नाटक ही हू सेज़ यस एंड ही हू सेज़ नो का बच्चों के लिए ‘ अगर और मगर‘ नाम से अनुवाद किया है। बहरहाल, वीणा भाटिया द्वारा किया गए इस अनुवाद का महत्त्व कुछ अलग है तो इसलिए, क्योंकि ब्रेख़्त की ये कविताएँ पहली बार हिन्दी पाठकों के सामने आई हैं। इन चुनिन्दा कविताओं का अनुवाद 1983-84 के दौरान किया गया। खास बात यह है कि अनुवाद के लिए कविताओं का चुनाव गोरख पाण्डेय ने किया था। इसके बारे में वीणा भाटिया ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है, एक दिन गोरखजी आए तो मैं ब्रेख़्त की कविताएँ पढ़ रही थी। उन्होंने मुझसे ब्रेख़्त की कविता ’द ब्रेड एंड द चिल्ड्रन पढ़ने को कहा। मैंने कविता पढ़ी और बाद में उसका अनुवाद भी किया। कुछ दिनों बाद मिलने मैंने वह अनुवाद दिखाया। मेरे किए अनुवाद को देख कर गोरख पाण्डेय मुस्कुराते हुए बोले – वाह साथीऔर फिर उन्होंने अनूदित कविता पर अपनी कलम चलाई। इसके साथ ही चल पड़ा अनुवाद का सिलसिला। ये कविताएँ गोष्ठियों में पढ़ी जाती रहीं, सुनी-सुनाई जाती रहीं।

पुस्तक गोरख पाण्डेय की स्मृति में प्रकाशित हुई, यह एक खास बात है। बहरहाल, अनुवाद के लिए ब्रेख़्त की जिन कविताओं का चयन गोरख पाण्डेय ने किया, उससे पता चलता है कि उन्होंने चौतरफा संकट से घिरे, अस्तित्व के लिए जूझते और संघर्ष करते लोगों की गाथा सामने लाने की कोशिश की थी। ब्रेख़्त का रचना-कर्म बहुत ही व्यापक और बहुआयामी है। उनमें से प्रासंगिक चयन गोरख पाण्डेय जैसे क्रान्तिकारी कवि ही कर सकते थे। वेश्या एविलन रो का उपाख्यान ही पाठकों को बेचैन कर देगा। पूँजीवादी व्यवस्था में श्रमिक वर्ग के साथ स्त्री का उत्पीड़न एक ऐसा सच है, जिससे मुँह नहीं चुराया जा सकता। इस संग्रह में शामिल कई कविताओं में यह सच उभर कर सामने आया है। ब्रेख़्त की इन कविताओं से गुज़रना बहुत आसान नहीं है। यह एक यंत्रणादायी प्रक्रिया है। जहाँ शब्द नश्तर बन जाते हैं, जहाँ उदासी लगता है मानो धरती से आकाश तक छा गई है, जहाँ अंतहीन बेचैनियाँ हैं, तो ये कविताएँ पाठकों को एक भयानक संसार में लेकर जाती हैं। वहाँ सवाल हैं, सवाल हैं भूखे बच्चों के, अबोध छालटी की पतित पावनी है। इस पेचीदी दुनिया में प्रिया के वास्ते गीत है तो माँ के लिए शोकगीत। बुढ़िया का विदागीत है तो बच्चों की रोटी का भी सवाल है। शहर के बाहर जमा आठ हज़ार ग़रीबों का हुजूमहै तो भव्य तोरण के नीचे अज्ञात सैनिक का व्याख्यान भी हो रहा है। वहीं, तीन सौ हलाक कुलियों का अन्तरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के नाम प्रतिवेदन है। ब्रेख़्त की कविताओं में लोरियाँ हैं, क्रान्ति के अनजान सिपाही की समाधि का पत्थरहै तो देशवासियों से जनता की रोटी का सवाल भी है।

ये ब्रेख़्त के विपुल रचना-संसार से एक अति संक्षिप्त चयन है, पर उनके जैसे क्रान्तिकारी कवि की रचनधर्मिता का पूरा आस्वाद कराने वाला। अनुवाद दरअसल पुनर्रचना है। कविता की पुनर्रचना असंभव-सी बात होती है। पर यह ज़रूरत है। वीणा भाटिया ने अनुवादक के धर्म का ईमानदारी से निर्वाह किया है, इसका पता कविताओं के पाठ से चलता है। उनमें जो सहज प्रवाह है, उससे कविता हमारे समय से और हमारी निजता से भी अनायास जुड़ जाती है। इस संग्रह की कुछ कविताएँ पहले पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हो चुकी हैं।

हमारे समय के एक महत्त्वपूर्ण कवि विजेन्द्र ने लिखा है, यह सवाल बार बार उठेगा कि आखिर ब्रेख्त को आज पढ़ना समझना क्यों जरूरी है। जिन संकटापन्न तथा त्रासद हालात में ब्रेख़्त ने अपना कवि कर्म किया, आज भी हालात वैसे ही हैं। पूँजीकेंद्रित व्यवस्थाएँ अपने चरम पर मनुष्य का शोषण कर रही हैं। साम्राज्यवाद नये रूप में पहले से भी अधिक आक्रामक और एकध्रुवीय हुआ है। सर्वहारा के पक्षधर कवि के सामने बड़ी चुनौतियाँ तथा जोखिम आज भी बदस्तूर हैं। ऐसे में, ब्रेख्त को पढ़ना हमें अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग करेगा। हमें हर प्रतिकूल स्थिति में अपनी वैचारिक आस्था को बनाए रखने के लिये प्रेरित करेगा। उल्लेखनीय है कि विजेन्द्र ने ब्रेख़्त की कविताओं के अनुवाद किए हैं और उनकी रचनाधर्मिता पर लिखा भी है।

ब्रेख़्त एक बेहद जटिल समय के कवि हैं। जब वे लिख रहे थे, जनपक्षधर तथा लोकधर्मी कवियों के लिए परिस्थितियाँ जानलेवा और जोखिम से भरी हुई थीं। फासिज़्म के उभार ने पूरी दुनिया के लेखकों के लिये विकल्प की चुनौती खड़ी कर दी थी। आज ये चुनौती हमारे सामने बहुत ही तल्ख़ रूप में उभर कर आई  है। ब्रेख़्त के समय में सवाल था कि लेखक तटस्थ रहें, लोकतंत्र और समाजवाद के लिए जनता के साथ संघर्ष में शरीक हों या फासिज़्म को स्वीकार करें। वे इन दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियों के लिये बहुत चिंतित थे। ब्रेख्त के नाटकों और कविताओं में जो यथार्थ सामने आया है, वह इतिहास की इन्हीं परिस्थितियों की देन है।

ब्रेख़्त ने ज्यादातर छोटी कविताएँ लिखी हैं। इस संग्रह में जिन कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया गया है, वे अपेक्षाकृत बड़ी या लम्बी कविताएँ हैं। ये जटिल उपबंधों की कविताएँ हैं। ऐसी कविताओं का अनुवाद करना बहुत आसान नहीं होता। वीणा भाटिया ने अनुवाद के लिए इन कविताओं का चयन किया, इसके पीछे सम्भवत: एक बात यह भी है कि ज्यादातर अनुवादकों ने इन्हें छोड़ दिया था। बहरहाल, जटिल और लम्बी कविताओं के अनुवाद में भी उन्होंने सहजता और प्रवाह बनाए रखा है। कविताएँ संप्रेषणीय हैं। उनमें दुरूहता और बोझिलता नहीं है। संग्रह में शामिल तीन कविताओं के अंश -
वेश्या एविलन रो
मैं आपको
कभी नहीं मिल पाऊंगी
क्राइस्ट मेरे प्रभु
आप एक वेश्या की खातिर
तो नहीं आ सकेंगे न,
और मैं
अब एक बदनाम औरत हूँ
मस्तूलों के दरमियान
वह घंटों भागती
उसका दिल दुखता था
उसके पैर दुखते थे

जब तक कि
एक अन्धेरी रात में
जब उसे कोई नहीं देख रहा था
खुद-ब-खुद
वह उस तट को ढूंढने निकल गई।
बच्चों की रोटी
धर्म के महन्तों ने
बच्चों के भूख से तड़पते हुए देखा
जिनके चेहरे पीले और कुम्हालाये हुए थे

उन्होंने
उन बच्चों के कुछ भी नहीं दिया
भूखा तड़पने दिया

संकट अब आ पहुंचा
अब वे रोटी के छिलके की खातिर लड़ेंगे
और महज गंधों से भूख शान्त करेंगे।

रोटी तो
पशुओं के खिलाई जा चुकी है
वह सड़ गई थी
और बहुत सूखी भी

इसलिए
हे ईश्वर
तुम अपनी दुनिया में
उनकी खातिर थोड़ी रोटी बचा रखना।  
माँ के लिए शोकगीत
उसकी वेदनाओं का ओर-छोर नहीं था
मौत जिसके जीवन से
कतई शर्मिन्दा नहीं थी
और तब
वो मर गयी
और तब उन्हें लगा
उसका जिस्म
एक बच्चा था।
वह वन में पली पुसी
उन चेहरों के बीच मरी
जिन्होंने उसे हमेशा
मरते देखा था।

और वे बेहिस थे
कौन क्षमा करता था उसे
उसके दुख लिए
फिर भी वह
घूमती फिरी
उन्हीं चेहरों के इर्द गिर्द
जब तक मर ही न गयी।

संग्रह में शामिल सभी कविताओं के अनुवाद में यह सहज बोधगम्यता दिखाई पड़ती है।
संग्रह में गोरख पाण्डेय पर एक परिशिष्ट है, जिसमें उनके दो साथियों के लेख हैं। मनोज कुमार झा ने स्वप्न और क्रान्ति के कवि गोरख पाण्डेय लेख में उनकी रचनाधर्मिता और सरोकारों पर विस्तार से प्रकाश डाला है, साथ ही प्रगतिशील-जनवादी साहित्य आन्दोलन से जुड़े कुछ ज्वलंत सवाल भी उठाए हैं। उनके दूसरे साथी प्रोफेसर ईश मिश्र ने सामाजिक बदलाव के कवि गोरख में लिखा है कि गोरख पाण्डेय की कविताएँ आम जन को अनंत काल तक जगाती रहेंगी।

कहा जा सकता है कि ब्रेख़्त की इन कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत कर के वीणा भाटिया ने अपनी लिटटरी एक्टिविस्ट की भूमिका का निर्वाह किया है। इससे निस्संदेह नई पीढ़ी को मानसिक खुराक और ऊर्जा मिलेगी।

पुस्तक – वेश्या एविलन रो – ब्रतोल्त ब्रेख़्त की कविताएँ
अनुवाद वीणा भाटिया
प्रकाशक वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर
मूल्य 70 रुपए
प्रथम संस्करण 2016

Wednesday, 2 March 2016

मानवीय संवेदनाओं के दरवाजे पर दस्तक देती हैं कविताएँ :समीक्षक -डॉ. सारिका मुकेश

दोस्तों, आज इस इक्कीसवीं सदी तक पहुँचते-पहुँचते हम शिक्षित तो खूब हुए पर हमने प्रकृति को ध्वंस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी I कभी-कभी तो यूँ लगता है कि हमारी सारी प्रगति और उन्नति के मूल में यह विध्वंस ही छिपा है I हमने प्रकृति का सारा संतुलन बिगाड़ कर रख दिया है I जब कभी सुनामी या उत्तराखण्ड जैसी प्राकृतिक आपदाएं आती हैं तो हम इस पर खूब भाषणबाज़ी करते हैं पर अगले ही क्षण फिर से इससे खिलवाड़ करने लगते हैं I हम सब अपने स्वार्थ में अंधे होकर अपने वर्तमान में होने वाले व्यवसायिक फ़ायदे में लगे हैं, भविष्य की तो मानो हमें कोई चिंता ही नहीं है I नदियों से अवैध खनन का मामला हो या अंधाधुंध वनों की कटाई या फिर पहाड़ों को काट-काटकर बस्तियाँ और शहर बसाना हो या बालिका-भ्रूण हत्याएं...सब कुछ असंतुलन ही तो पैदा कर रहा है जिसके परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भोगने के लिए अभिशप्त होंगी I अगर हम ऐसे ही चलते रहे तो उनके लिए यही तोहफ़ा तो छोड़कर जाएँगे ना I
आजकल चारों ओर पर्यावरण बचाओ, स्त्रियाँ बचाओ की खूब चर्चा है I इस विषय पर समूचा जगत चिंतित भी दिखाई दे रहा है और एक साथ खड़ा भी I जगह-जगह इस पर बड़ी-बड़ी कांफ्रेंस हो रही हैं और खूब लिखा पढ़ा जा रहा है I सरकारें भी वक़्त-वक़्त पर इस संबंध में अपने तमाम दावें पेश करती रही हैं परंतु हालातों में कहीं पर भी शायद ही संतोषजनक स्थिति में सुधार दिख रहा है I
ऐसे परिवेश में कवि का मन भी इससे कैसे अछूता रह सकता है? श्री संजय वर्मा ‘दृष्टि’ जी ने हमें मनावर, जिला धार (म.प्र.) से अपनी पुस्तक ‘दरवाजे पर दस्तक’ भेजी है I पुस्तक इसी सामयिक समस्या पर केन्द्रित है इसीलिए हमने सोचा कि आपको भी इससे रुबरु करा दिया जाए I हमारा उनसे फ़ेसबुक पर ही परिचय हुआ और वो परिचय भी एक बेटियों पर लिखी एक कविता के माध्यम से ही हुआ था और फिर हम एक दूसरे की रचनाओं के साझीदार होते चले गए I अब जब उनकी यह पुस्तक देखी तो समझ में आया कि उनकी कविताओं का प्रमुख उद्देश्य है बेटी बचाओ/पर्यावरण बचाओ I सच में अगर हम ध्यान से देखें तो स्त्री ही तो प्रकृति का साक्षात् रूप होती है; दोनों ही सृजन करती हैं और दोनों के बिना ही यह धरती बंजर होने में देर नहीं लगेगी I
पुस्तक के आवरण चित्र में एक प्यारी-सी बच्ची दरवाजे पर दस्तक देती दिखाई दे रही है, उसकी दस्तक की आवाज़ सुनकर जब हमने पुस्तक को खोला तो यही बच्ची जगह-जगह पर तमाम मोहक रूपों में दिखी और हम अभिभूत होते चले गए...
पायल छनकाती बेटियाँ,
मधुर संगीत सुनाती बेटियाँ,
पिता की साँस बेटियाँ,
जीवन की आस बेटियाँ...
उम्मीद की किरण बेटियाँ,
मेहँदी रचती बेटियाँ,
ख्वाबों के रंग सजती बेटियाँ,
ससुराल जाती बेटियाँ...

बिटिया की भ्रूण-हत्या के मुद्दे पर कवि को अपने भीतर से उस भ्रूण के दर्द का अहसास होता है:

होता था बिटिया से
घर-आँगन उजियारा
मौत पंख लगा के आई
कर गई सब जग अँधियारा...
***
आने दो जरा इस धरा पे मुझको
नेह भरी निगाह से देख सकूँगी मैं सबको...
जीने का अधिकार
ईश्वर ने दिया सबको
तो क्यों मारते हो हमें
बस आने दो इस धरा पे मुझको...
***
कई स्थलों पर कविताओं में प्रकृति में बेटी का चित्रण एकदम साकार हो उठा है:

पत्तियों का डाली से छूटना आया
पतझड़ में जैसे वृक्ष को रोना आया
परिंदों का था ये पत्तियों का पर्दा
छाँव छूटी और तपिश गहराया...
***
कवि अंत में अपना यह संदेश तमाम आवाम तक पहुँचाना चाहता है:

हक़ बेटी का भी होता है
क्यों करते हैं भ्रूण-हत्याएँ
रोकेंगे मिलकर जब इसे
तभी रोशन होंगी
रिश्तों की बगियाएं
***
बेटियाँ और वृक्ष से ही तो कल है
इनसे ही जीवन जीने का एक-एक पल है
संकल्प लेना होगा इन्हें बचाने का आज
दुनिया बचाने का होगा ये ही एक राज
***
इसके अतिरक्त जल-संरक्षण, नेत्रदान, आतंकवाद जैसे मुद्दों को भी छुआ है तो साथ ही कुछ श्रंगार की भी कविताएँ हैं I किताबों के बारे में भी एक बढ़िया कविता है, उसकी कुछ पंक्तियाँ:

किताबें भी कहती हैं शब्दों में
हमसे कुछ ज्ञान पाते रहो
हमें भी अपने घरों में फूलों की तरह
बस यूँ ही तुम सजाते रहो...

इस कविता के अंत में वो कहते है :

मांग कर ली जाने वाली किताबों को
पढ़कर जरा तुम लौटाते रहो I
***
इतने सुंदर विचारों को शब्द-रूप देने के लिए संजय जी नि:संदेह धन्यवाद के पात्र हैं I हमारी ओर से उन्हें अनेकों हार्दिक मंगल कामनाएँ I 



(डॉ. सारिका मुकेश)

Wednesday, 24 February 2016

गजल संग्रह : हर घर में उजाला जाए -प. अरविन्द त्रिवेदी:समीक्षक - संजय वर्मा "दृष्टि "



जनमंचों पर अपनी साहित्य विधा के हर रंग का जादू बिखेरने वाले वरिष्ट कवि प. अरविन्द त्रिवेदी "सनन " यूँ तो जन -जन में लोकप्रिय है उतनी ही उनकी धार्मिक एवम साहित्यिक  कर्म में रूचि अम्बर को छू रही है । स्वयं को बड़ा कभी न महसूस समझने वाले प. अरविन्द त्रिवेदी "सनन " का सहयोग की भावना का एक नया रूप और मंशा  गजल संग्रह में स्पष्ट झलकती है । गजल संग्रह के शीर्षक से ही हमें इस बात का पता चलता है कि -"हर घर में उजाला जाये "सच मुच  आपने अपने विद्वान् पिता नाम तो रोशन किया ही है साथ ही महाकाल नगरी के अलावा प्रदेशों में भी अपनी पहचान के झंडे गाड़े है ।  सरस्वती वंदना में आप के स्वर कानों में मिश्री घोलते वही काव्य रसिकों को शब्दों के चुम्बकीय आकर्षणता  में बांध कर एक नई  उर्जा का संचार कर देते है । इस कला की जितनी भी प्रशंसा  की जाये  उतनी कम होगी। 
वर्तमान हालातों पर गजल की सटीक पक्तियाँ कुछ यू बयां करती है -"ये गीत और भजन तो है टी वी डूबा गई /सुनसान सनन कह रहा चोपाल देखकर " । निराशा को दूर करने का मूलमंत्र भी दिया है-  "यूँ  हार  कर के मोंत का दामन न थामिये /हर इक समस्या का है समाधान जिन्दगी " ।सनन की सोच काफी गहराई वाली है - "जिसकी सूनी आँखे सब कह जाती है /वह बच्चा भी मुझको शायर लगता है  "
जन जन में लोकप्रिय वरिष्ट कवि प. अरविन्द त्रिवेदी "सनन " का नाम ही काफी है । लोगो से उन्हें असीम प्यार मिला है और यही बात गजल  में भी दिखलाई पड़ती है -"मेने प्यार पाया है महफिलों में लोगों से /वर्ना मेरी जिन्दगी तो जिन्दगी नहीं होती "वही धर्मनिरपेक्षता  का पुनीत सन्देश दिया है - "भाई चारा बढता है मिलने और मिलाने से /कबूतर उड़ाने से शांति नहीं होती " । प्रेम की कशिश को गजल की  में बेहतर तरीके से ढाला है -जब जब तेरी याद के बादल छाते है /आँखों में बारिश का मोसम होता है " व्  " तेरी गजल दिल की बात कहती है /तेरी बातों में कितना दम होता है " मालवी बोली की मिठास की पूरी दुनिया कायल है नशा मुक्ति का सन्देश हास्य रस में गजब दिया -" घर से चल्या था बन के वी लाड़ा बजार में /पीके  वी दारू अब पड्या आडा बजार में " सनन जी की हर गजल दमदार है  और दिल को छू  जाने वाली है यकीं न होतो इन पंक्तिओं पर तनिक गोर फरमाए -"में सुबह जागूं या कोई है जगाता मुझकों /न उठूँगा तो फिर आयेंगे उठाने वाले "। हर घर में उजाला जाये १००% दिलों में जगह बनाएगी इसमें कोई शक नहीं है। हमारी यही शुभकामनाये है ।
गजलकार -प. अरविन्द त्रिवेदी "सनन "
प्रकाशक -शब्द प्रवाह साहित्य मंच                                     संजय वर्मा "दृष्टि "
                ए /99 , व्ही। डी.मार्केट                              125 .शहिद भगत सिंग मार्ग
            उज्जैन (म प्र ) 456006                                    मनावर जिला -धार      
  मूल्य -  195 /-रूपये