Sunday, 21 February 2016

आलोचना: डॉ . नीना मित्तल- सतरंगे स्वप्नों के शिखर

आलोचना: डॉ . नीना मित्तल- सतरंगे  स्वप्नों  के शिखर


 सतरंगे  स्वप्नों  के शिखर : मधु संधु


आधुनिक हिंदी साहित्य जगत में डॉक्टर मधु संधु एक सशक्त हस्ताक्षर हैं बहुमुखी  रचना संपन्न लेखिका के कहानी संग्रह , अनेकों शोध ग्रंथों , अनुवादों , अनेक पत्रिकाओं में छपे उनके लेखों के अथाह जल परिमल के  मध्य ' सतरंगे स्वप्नों के शिखरउनका प्रथम कविता संग्रह है लगभग ४९ कविताओं का यह रचना समूह हमें जीवन की जहाँ बड़ी से बड़ी विसंगति से रूबरू करवाता है , वहीँ उनकी ज़िन्दगी को तरंगित कर देने वाली एक छोटी सी हरकत  भी उससे  छूट नहीं पाई
अधिकतर कविताएँ मुख्य तौर पर 'नारी विमर्श ' के दायरे में रहकर लिखी गई हैं , पौराणिक युग से लेकर आज  की औरत की व्यथा कथा कही गयी है स्त्री विमर्श कविता में लेखिका  ने लिखा है -
                             तुम्हे पता है
                         राजकन्याओं की नियति
                             डम्बो पति
                     माओं की आज्ञाएं शिरोधार्य करके
                      पत्नियों को मिल बाँट चखते थे
                         शूरवीर पांडवों की तरह
 वह पुरुष के पाशविक निर्णय का  दंश  सहती हुई स्वयं को पीड़ा की गहरी खाई में धकेलती रहती है क्योंकि जानती है कि पुरुष का न्याय सदैव ही उसका यातना शिविर रहा है 'मेरे देश की कन्या ' की नियति के बारे में वे  कहती हैं -
                         मेरे देश की स्त्री
                       इंद्र के बलात्कार और
                 गौतम के शाप की शिकार अहिल्या थी
                      जो पत्थर बन सकती थी
                     क्योंकि उसे मालूम था कि
                       राजन्याय मिलता तो
                   भंवरी बाई से अलग नहीं होता
इस न्याय की कड़ी में वह राम के देवत्व को भी महामानव का नाम नहीं दे पाती क्योंकि आज के रावण को राम नहीं बल्कि महा रावण ही मार पायेगा बुराई का अंत अच्छाई से नहीं बल्कि अति बुराई से ही हो पायेगा ।अपनी कविता महा रावण में कवयित्री लिखती है -
                        कितना  बड़ा झूठ है
                              कि
                         रावण मरते हैं
                        उन्हें मारने के लिए
                           राम की नहीं
                      महा रावण की आवश्यकता है
 वास्तविकता की अनुगूंज से अनुप्रेरित यह कविताएँ अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं।
उनकी स्त्री विमर्श को रेखांकित करती हुई कविताएँ हमारी धर्म और न्याय व्यवस्था के मुंह पर  करारा तमाचा  है जिसमें प्रत्येक  क्षण औरत को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी है मजबूरी में किए  हुए उसके हर त्याग  को आज उसकी मेहनत  की पराकाष्ठा मानकर उससे वही अपेक्षा की जाती रही  है परन्तु नारी सशक्तिकरण की राह में आज की विवेकशील नारी आसमान की बुलंदियों को छूना तो चाहती है पर पैर ज़मीन के ठोस धरातल पर  रखकर उन्नति का अमृत चखना चाहती है वह पहचान पाना चाहती है अपने पंख काट कर हवा में उड़ना नहीं चाहती
                              सतरंगे स्वप्न पूरे करके भी
                                 मेरे पैर धरती पर
                                    जमे रहें
                                    जमे रहें।
नारी की अर्थ स्वतंत्रता ने आज पितृसत्तात्मक ढाँचे को  चरमरा दिया है लेखिका लिखती  है
                                अर्थ स्वतन्त्र स्त्री ने
                               पुरुष सत्ताक सिंहासन के
                                    ट्रेड सेंटर को
                               आतंकवादियों सा गिराया है
                         परिवार तंत्र में एक नया अध्याय भिड़ाया है
इस संग्रह में कवयित्री ने समाज में गहराते प्रश्नों के दंश  की पीड़ा को महसूस किया है वहीं उन्होंने छोटी छोटी समस्याओं को भी महत्व् दिया है  जो निजी जीवन में इतनी महत्वपूर्ण लगती हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता नौकरी के लिए जाने पर पीछे नौकरानियों  के एकछत्र निष्कंटक साम्राज्य  की समस्या  है क्योंकि नौकरों के  बिना स्वयं नौकरी नहीं की जा सकती अपनी कविता मेमसाहब में लेखिका लिखती है
                  जब तुम अपनी डेढ़ छटांक की लौंडिया को
                               मेरे सहारे छोड़
                       सुब्हे नौ बजे निकल जाती हो
                     तो यहाँ सिर्फ मेरा ही राज चलता है
ग्रेडेड वेतन पाने वाले सेवा कर्मचारियों को अर्धसरकारी संस्थाओं से सेवाएं प्राप्त करने के लिए चक्कर लगवाये जाते हैं
शिक्षा का बाजारीकरण  करते एंट्रेंस टेस्टों की विभीषिका का वर्णन करते हुए वे कहती हैं -
                   स्कूल / कॉलेज / विश्व विद्यालय
                      निपट भी जाए तो भी
                       दैत्याकार सा एंट्रेंस
                       रास्ता रोके  खड़ा है
 सेमिनार महोत्सव मनाने के लिए प्रतिबद्ध प्राध्यापक वर्ग है और यहाँ प्रमाणपत्रों का तामझाम बिकता है उलझे विचारों के व्यापारी अपनी विचार मुद्रा का विनिमय करते हैं और प्रतिभागियों को सारी  श्रृंखला का शिकार होना पड़ता है संगोष्ठी कविता  में  इस हक़ीक़त को बयान करती हुई वे लिखती हैं -
                            लो खुल गया
                   विश्व विद्यालय अनुदान आयोग का पिटारा
                          ले  जाओ  संगोष्ठियां
                           बटोर लो प्रमाण पत्र
                            प्रमोशन के लिए
सामाजिक परिवेश से सम्बद्ध लेखिका पारिवारिक परिवेश से भी उसी तरह घिरी है जैसे अशोक के वृक्षों की कतारबद्धता से सुसज्जित घर का सलोना  बगीचा जिसमें आत्मीयता की नरम घास बिछी है पारिवारिक रिश्तों के गहराते अहसास मर्म को छू जाते हैं टीसते  रिश्तों व् उत्सव लगते रिश्तों का सहज वर्णन है , तलाश है , प्रतीक्षा है माँ- बेटी - नानी की कड़ी को जोड़ती रिश्तों की गरिमा है
यह  पूरा काव्य संग्रह माँ - बेटी  के अनन्य रिश्ते के एक परकोटे से  घिरा हुआ लगता है जिसमें माँ हर पल अपनी बेटी के साथ ही बड़ी होती है कदम कदम पर सखी , सहेली, सहचरी बन साथ निभाने वाली बेटी कब बड़ी होकर ससुराल चली जाती है और मन को उसके मेहमान बन जाने की वेदना को सहन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है ।अपने दाम्पत्य जीवन में शारीरिक व् मानसिक  रूप से  कोल्हू के बैल की भांति  पिसती पुत्री बाहर से टोकरी भर रुपये लाकर भी घर में दोयम दर्जा ही प्राप्त करती है बेटी के शरीर पर पड़ती हुई इस एक एक सिलवट की जकड़न माँ के सिवाय कोई और नहीं  जान पाता। बेटी के प्रति इतनी संवेदनशील माँ अपने नाती नातिनों के लिए अत्यंत उदार, स्नेहशील हो उठती है   दूसरों के लिए अमंगलकारी शनिवार उसे अपने लिए उत्सव का दिन लगता है दीपावली लगता है उन्हें देखकर नानी का दिल बेवजह खुशियां मनाता है इन कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि लेखिका की दुनिया इन बच्चों के आसपास सिमट गई है यहाँ तक कि बड़े  होते हुए सहोदर रिश्तों में धीरे धीरे कैसी परिपक्वता जाती है,  इस अंतर को उन्होंने बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा है
सारी दुनिया, सारे नाते रिश्तों की बात करने के बाद कहीं एक कोना ऐसा बचता है जहाँ निजता छिपी पड़ी रहती है उस निजता में अपने जीवन के रागात्मक तंतु के खो जाने की टीस है , महत्वाकांक्षाओं की आसमानी बुलंदियों में हाथ छूट जाने का दर्द है अपनी पीड़ा को जुबां देती हुई लेखिका कहती है -
               तुमने पल में झटक डाला हाथ मेरा
               साथ मेरा
              और छूते बादलों को मान बैठे
              छू लिया अंतिम शिखर
ज़माने के बदलते तौर - तरीकों में जीवन की बदलती भूमिकाओं में स्नेह का धागा चटखता जा रहा  है व्यक्ति से शून्य हो जाने की वेदना , मौत से पहले मरने की अनुभूति तब गहर गंभीर हो जाती है जब रिश्तों पर कटार चल जाती है बिना किसी शर्त के जीने की सुविधा नहीं रहती और दोनों ओर प्रेम पलता है का एहसास  गुम हो जाता है लेखिका  लिखती है  -
                       मेरी उम्र सिर्फ उतनी है
                     जितनी अनामिका की अंगूठी से
                           सिंदूरबाजी से
                      मंगल सूत्र धारण से पहले
                        घूँट घूँट पी थी
 अपनी माँ से जुड़ाव की अनन्यता व् पिता के  प्रेम की गरमाई  का रेत की तरह हाथ से फिसल जाना और माँ की तपस्या से जीवन की सफलता हासिल होने की गहरी अभिव्यक्ति इन कविताओं में संजोई गई है लेखिका माँ कहने व् माँ बनने के दोनों अनुभवों को भरपूर जीती है ।सफलता के शिखरों को छू पाने के कारण आज की युवा पीढ़ी प्रवास के लिए मजबूर है यही मजबूरी आज स्टेटस सिंबल व् सफलता का पैरोमीटर  बन चुकी है अकेले होना  व्  अकेले कर जाने की व्यथा से कहीं दूर पितृऋण चुकाने की उड़ान बन गई है
अपनी कविताओं में लेखिका ने समय को बड़ी सुंदरता से परिभाषा बद्ध किया है बदलती परिस्थितियों, बीतते वक्त और विभिन्न भूमिकाओं में समय के परिवर्तन का बखूबी चित्रण किया है स्वयं के पास समय के सागर का सैलाब और दौड़ती भागती बेटी का समयाभावका सुन्दर वर्णन है
लेखिका कहती है-
                        पर उम्र उम्र की बात है
                       उधर समय का अकाल है
                       इधर समय का सैलाब है  
कवयित्री को कहीं ऐसा लगता है इस ऊहापोह में स्नेहाभाव  रिसने लगा है समय की कमी ने कंप्यूटर की 'लाइक ' तक सीमित कर दिया है कहना अतिश्योक्ति  नहीं होगी कि डॉ॰ मधु संधु जी का यह काव्य संग्रह भाव पक्ष के जिन विचार बिन्दुओं की सतरंगी इंद्रधनुषी छटा को लिए चला है,  अपने कलापक्ष के माध्यम से उनकी अभिव्यक्ति  में भी उन्होंने कोई कसर   बाकी नहीं छोड़ी
रचना संग्रह में  तत्सम , तद्भव तथा  आधुनिक अंग्रेजी शब्दों की अद्भुत छटा देखने को मिलती है। इन शब्दों का चयन लेखिका की रचना के मर्म को सम्प्रेषित करने में पूरी  तरह सहायक है। अंग्रेजी भाषा के प्रचलित शब्द व्हाट्सप्प , लाइक , कमेंट करना , चैटिंग करना इत्यादि समयानुरूप शब्दों का प्रयोग  किया है उनकी सहोदर किशोर स्टाफ जैसी कविताओं में चित्रात्मकता झलकती है रोगों में जिजीविषा पैदा करने के साथ साथ जो उसे इकसठ से सोलह की तरफ मोड़ने का जोश प्रदान करती है
अतः डॉ॰ मधु संधु का यह काव्य संग्रह अपनी संवेदनशीलता , समाज सापेक्षता , वैयक्तिता , परिवेशमयता  , रिश्तों की बुनावट के गहरे सरोकार लिए हुए है

प्रकाशक: अयन, दिल्ली
वर्ष: 2015
पृष्ठ संख्या: 110
मूल्य: 240 रूपये
आई॰ एस॰ बी॰  एन॰ : 978-81-7408-842-0

                                              
                                                        द्वारा   - डॉ . नीना मित्तल
                                   प्रोफेसर
                                                        हिंदी विभाग 
                                                       प्रेम चंद मारकंडा एस डी कॉलेज

                                                        जालंधर शहर, पंजाब ।  .        

Wednesday, 16 December 2015

भारतीय समाज का यथार्थ : ‘भूतों का इलाज’





‘भूतों का इलाज’ देवेन्द्र कुमार मिश्रा द्वारा लिखा गया एक रोचक एवं पठनीय कहानी संग्रह है. इस कहानी संग्रह में समाज के छुए-अनछुए पहलुओं पर बड़ी ही गहनता और मार्मिक रूप से लिखा गया है. संवाद शैली ऐसी है कि कहानी को एक बार पढना शुरू किया जाए तो पूरी पढ़े बिना नहीं रहा जाता. समाज के विभिन्न पहलुओं पर लिखी गयी कहानियां दिल को छू जाती हैं और यह सोचने को मजबूर कर देती हैं कि इतने समृद्ध कहे जाने वाले समाज में कुछ चीजें आज भी ज्यों की त्यों हैं.
मुनाफे और शोषण पर आधारित पूंजीवादी समाज में मजदूर और मालिक के बीच कभी दोस्ताना व्यवहार नहीं हो सकता. समाज में इन दो वर्गों के बीच हमेशा लड़ाई रही है और लड़ाई रहना लाज़मी है. व्यवस्था के पोषक “धर्म के लिए हजारों व्यर्थ उड़ा देंगे. खून-पसीने की कमाई खाने वालों का हक मरेंगे. भिखारियों को मुफ्त पैसा बाँटना धर्म है और मेहनत करने वाले को वाजिब दाम देना बेवकूफी समझते हैं. हमसे अच्छे तो ये भिखारी हैं. इनके लिए पेट्रोल-डीजल की कीमत है. खून-पसीने की कमाई की कोई कीमत नहीं.”

आज के वैज्ञानिक युग में लोग अवैज्ञानिक तत्वों पर ज्यादा यकीन रखते हैं. किसी भी बीमारी और समस्या का समाधान वे अंधविश्वास के रूप में खोजते है. पांडो-पुरोहित, मुल्ला-मौलवियों द्वारा तन्त्र-मन्त्र, भूत प्रेत जैसी चीजों का इलाज करवाते हैं. बजाय इसके वे समस्या के भौतिक कारणों को जाने, उल्टा वे इन आडम्बरों, अंधविश्वासों के चंगुल में जा फंसते हैं-
“पूर्णिमा, अमावस्या को मेरी बीवी अचानक जोर जोर से साँसे भरने लगती है. ...वह थर-थर कांपने लगती है. वह जोर जोर से चीखने लगती है बचाओ-बचाओ. वो मुझे अपने साथ ले जायेगा. ...जब तक माइके रहती है ठीक ही रहती है. ससुराल आते ही फिर वही सब शुरू हो जाता है.
“किसी मनोचिकित्सक को दिखाया.”
“भूत प्रेत का साया है और क्या? मैं डॉक्टर हूँ तो क्या मानता नहीं हूँ इन सब बातों को.”

देवेन्द्र कुमार मिश्रा ने महिलाओं या लड़कियों के प्रति समाज के रवैये को बहुत ही मार्मिक ढंग से पेश किया है जो यह दर्शाता है कि आज भी औरत को एक वस्तु के अलावा और कुछ नही समझा जाता है. लड़की की खूबसूरती! उसे तो अभिशाप समझा जाता है. इस खूबसूरती के कारण परिवार व समाज में उसका जीना मुश्किल कर दिया जाता है. समाज के पिछड़ी मानसिकता के लोग हर खूबसूरत चीज को पा लेने की चाह में इस हद तक गिरते हैं कि सामने वाले का जीना दूभर हो जाये. नतीजन घर वाले भी लड़की को तरह-तरह की हिदायतें देने लगते हैं कि घर जल्दी आये, ज्यादा से ज्यादा घर पर ही रहे. कोई बाहर का इंसान बैठने आये तो घर के अंदर चली जाये और ना जाने क्या-क्या.... और तो और कभी उसे अपनी पढाई घर रहकर करनी पड़ती है. इस घटिया सोच का खामियाजा एक बेकसूर, मासूम लडकी को भुगतना पड़ता है. “ज्यादा इतराओ मत. हम में से किसी एक को चुन लो. नहीं तो बदनाम कर देंगे. ...कुछ ऐसा कर गुजरेंगे कि किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी. ...अगर हमारे खिलाफ आवाज उठाई तो एसिड से चेहरा बिगाड़ देंगे.”
“एक रोज कॉलेज जाते समय उस गुंडे ने उस पर एसिड भरा बल्ब फेंक दिया.”
देवेन्द्र ने ‘फांसी’ कहानी का गठन बहुत ही बेजोड़ ढंग से प्रस्तुत किया है. भारतीय न्यायव्यवस्था राजनीति पर आधारित जान पडती है. गरीब को न्याय नहीं, मीडिया पहले ही व्यक्ति को मुजरिम करार देती है. “देखो भाई! राजनीति, मीडिया के दबाव के चलते तो न जाने कितने केस बनाए होंगे. कितने बेगुनाहों को थर्ड डिग्री दी होगी. हां, कुछ मुठभेड़ जरूर हुई जो बिलकुल फर्जी थी, लेकिन हमें तो ऊपर वालों के आदेश का पालन करना था.”
प्रस्तुत कहानी संग्रह में देवेन्द्र कुमार मिश्रा की ‘सेवा संगठन’, ‘जीत या हार’, ‘प्रश्न’, ‘गुमनाम शिकायतें’, ‘खुदाई’, ‘आभिजात्य’ एवं ‘ईमानदार लाश’ भारतीय समाज के यथार्थवादी जीवन का सटीक वर्णन है.
 समीक्षक : आरिफा एविस
भूतों का इलाज : देवेन्द्र कुमार मिश्रा | बोधि प्रकाशन | कीमत :100

Monday, 30 November 2015

आशा के दीप : विजय जोशी " शीतांशु "


कई दिनों के इन्तजार के बाद मेरे हाथ में जब आदरणीय विजय जोशी " शीतांशु " जी की लघुकथा संग्रह "आशा के दीप " आई तो अपार हर्ष का अनुभव महसूस हुआ । उनकी पहली लघुकथा संग्रह पढते हुए मैने पाया की उनकी कलम पर पकड़ बहुत ही संतुलित है । उनके लेखकीय कर्म की सशक्तता को मैंने कथा के शब्द -शब्द पर महसूस की है। कथा में उचित शब्द चयन का निर्वाह उनका तो देखते ही बनता है ।
कहा जाता है कि किसी लेखक की तासीर को आप उनकी रचना से पहचान सकते है । मैने पाया कि आदरणीय विजय जी का प्रकृति प्रेम बहुत गहरा है और पर्यावरण के प्रति सचेतता भी इनकी लघुकथाओं में मिलती है ।
अंधविश्वासों के जंजीरों को तोडने की कुलबुलाहट को उनकी लघुकथाओं में आसानी से देखा जा सकता है , तो वहींं दूसरी तरफ देश में पलती राजनीतिक विसंगतियों से उनका मन त्रस्त भी है। नाते -रिश्तेदारी के प्रति उनकी आस्था तो कथाओं के परिदृश्य में देखते ही बनती है।

पारिवारिक मुल्यों पर उनकी नैतिक जिम्मेदारी समाज और साहित्य दोनों के लिये अवर्णनीय है ।
जैसा की लघुकथा के मापदंड में इसका विसंगतियों से ही जन्म लेना जाहिर है ,इस बात पर आदरणीय विजय जी यहां बिलकुल स्पष्ट हैं। कई जगह कथाओं में तो बेहद तीक्ष्ण पंच बने है जो चौंकाने वाले है पाठकों को।

इनकी कई लघुकथा ने मुझे बेहद प्रभावित किया है जैसे कि उनकी किताब की पहली लघुकथा " अजन्मी बेटी का दर्द " एक करारी चोट है उस सोच पर जहाँ बेटी को कमतर सोच के तहत लिया जाता है । बुढ़ापे में सहारा की आस पाल जिस वंशवृक्ष को पोषित किया उसी ने माँ को जड़ समेत उखाड़ वृद्धाश्रम का दरवाजा दिखाया। ऐसे में अजन्मी बेटी की टीस कोख में ऐसी उठी की पढते हुए पाठकों को भी ह्रदय तक झिंझोर गया ।
" पूजा " लघुकथा एक विधवा की रीति रिवाजों में शामिल ना हो पाने का दर्द है, जो बखूबी बयान हुआ है । हाँलांकि लेखक यहाँ लघुकथा का अंत करते हुए एक जबरदस्त पंच बनाते हुए चूक गये लेकिन भाव और संवेदना को रोपित करने में सफल रहे है ।

अपनी जमीन और संस्कार का असर लेखक के लेखन में साफ - साफ झलकता है ।
"आशा के दीप " उनकी किताब के नाम को सार्थक करती हुई तीक्ष्ण लघुकथा है जिसमें कम्पनी द्वारा भोले भाले कर्मचारी को बोनस सहित अच्छी तनख्वाह की "आशा के दीप" तले अपनी स्वार्थसिद्ध करती योजना को सफल बना कर भरपूर शोषण का रोपित होना हुआ है। यहां कथा बेहद ही मार्मिक बन पड़ी है।

" सब ठीक है " में कितना ठीक है परिवार ? अपने लायक बेटे द्वारा तिरस्कृत होने पर भी पुत्र को "सब ठीक है " का सन्देश भेजता है , लेकिन इन बातों में पिता का दर्द साफ तौर पर हर एक पंक्ति से झलक ही जाता है । राह ताक पथराई आँख ,विदाई के बेला में भी माँ के द्वारा बेटे को आखरी पैगाम भेजना की एक बार घर में बहु को लक्ष्मी पूजन के लिए घर लेकर आना , बेहद मार्मिक बन पड़ा है ।

" सफेद दाढ़ी वाले बाबा " साम्प्रदायिकता के आग में उठते लपटों में एक सद्भाव पुरूष का बलि चढ जाना वास्तव में एक चिंतन और मनन का विषय है ।

" ममता का साहस " माँ के लिए बच्चे का प्यार को बेहद काव्यमय लघुकथा हुई है । सुंदर अलंकारों का प्रयोग कथा को सुंदर प्रवाह दे गया है ।
वहीं " राष्ट्र भाषा हिन्दी " में यथार्थ के कसौटी पर कसी हुई हिंदी को लेकर हाथी के दांत को सार्थक करती नीति से पूर्ण ये लघुकथा मुझे दंग कर गई ।

" हिस्सा " में दहेज का बदलता स्वरूप से मैं चकित थी । गजब की पंचदार लघुकथा बनी है जो हमेशा लघुकथा के इतिहास में याद की जायेगी ।

" अनुकरण " में पिता का गलत होने का भाव बच्चे के मन में और कैसे अनुकरण करे पिता का ,इस दुविधा को आपने यहाँ बखूबी पेश किया है । सृजनात्मकता तो आपकी लगभग सभी लघुकथाओं में देखने को मिली ।

" सौदागर " पढते हुए मैने अपने ही देश में व्याप्त एक कडवी सच्चाई को अनुभव किया और एहसास हुआ की लेखक सिर्फ अपने अंचल तक ही सीमित नहीं है बल्कि समस्त देश को अपने सुक्ष्म नजरिए से दिल तक महसूस करते है ।
शाल - कम्बल के व्यापार में घाटा होना और हथियारों की खुलेआम खरीद फरोख्त को एक बच्चे के मुख से जो कि इन हथियारों के संदर्भ में खपत होने के अलावा बाकी दुष्परिणामों से अनजान था का कहना कि हम अब शाल - कम्बल ना बेच कर हथियार की दुकान लगाते है इसमें अधिक मुनाफा होगा , अद्भुत सृजन हुई है यह भी ।
लेखक की लगनशीलता , ज्ञानपिपासु प्रवृत्ति का होना भी मैने इनकी कथाओं में महसूस किया है ।

"घोषणा - पत्र " चुनाव राजनीति पर कटाक्ष करता हुआ बेहतरीन लघुकथा है ।
"बाँझ" एक स्त्री जीवन की पीड़ा के कटु सत्य को जाहिर किया है । घर के बाहर सम्मानिता किस तरह घर के अंदर अपने प्रति दुर्व्यवहारों को सहती है का चित्रण पढ कर मन कलप उठा । मै स्त्रियों के इस रूप को बरदास्त नहीं कर पाती हूँ अक्सर । स्त्रियों का इस तरह पढें लिखे होने के बाद भी चुप रह कर अन्याय को बढावा देना अंदर तक खलता रहा है ।
" घर - जमाई " तिरस्कार की परम्परा का निर्वाह जैसी करनी वैसी भरनी के हिसाब किताब को चुकता करते हुए मानवीय संवेदनाओं को क्षीण होने की पराकाष्ठा का वर्णन है ।
लोभीराम का "शुन्य बेलैंस " शब्द सीमा में बँधी हुई बेहद चुस्त दुरूस्त कथा है जिसमें लालच के जाल में उम्र भर की कतर व्योंत का हिसाब पल भर में कोई लूट कर निकल जाता है ।

आजकल की सोशल नेटवर्क के परिवार और दोस्ती पर भी अद्भुत कटाक्ष करते हुए " पडोसी धर्म " कि समस्त दुनिया से तो शुभ कामना पा ली आपने जन्मदिन पर ,लेकिन क्या पडोसी ने विश किया ?
ये कथा समसामयिक विषय पर लिखी गई बेहद कसी हुई रचनाकर्म हुई है ।

दीपक ,बंधन , प्रशिक्षण , राम का चुनाव , और डिग्री पढकर भी प्रभावित हुई हूँ ।
एक कथा हैै " सांत्वना राशी " ,जिसमें नेता जी के संवेदनहीनता को यथार्थ की तथ्यों पर बखूबी कटाक्षयुक्त कथा लिखे है ।

कुछ कथाओं में मैने कहानी का कथानक भी महसूस किया है जो लघुकथा में नहीं होना चाहिए था । कहानीनुमा इस रचना में कालखंड दोष भी लगता है ।
" माँ की आत्मा " एक अच्छी संवेदनशील रचना होते हुए भी ये लघुकथा के मानकों से बाहर है ।
कुल ४६ लघुकथाओं में मैने करीब ५ से ६ लघुकथाओं पर मेरी संतुष्टि नहीं हुई है । हालांकि आदरणीय विजय जी की यह पहली लघुकथा संग्रह है इस के मद्देनजर मैं इस संग्रह से प्रभावित भी हूँ ।
आने वाले दिनों में उनके लघुकथा के प्रति रुझान इस विधा को नयी ऊचाइयां प्रदान करेगी इसका मुझे पक्का यकीन है। महेश्वर की माटी की खुशबू देशव्यापी महक बिखेर कर इस लघुकथा विधा का परचम लहरायेगी इसका मुझे यकीन है।

समीक्षक -कान्ता रॉय
भोपाल