Wednesday, 18 November 2015

दंतकथा और अन्य कवितायें



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समीक्षक -वंदना गुप्ता 
दखल प्रकाशन से प्रकाशित शिरीष कुमार मौर्य का कविता संग्रह दंतकथा और अन्य कवितायेँ अपने समय को प्रतिबिंबित करने के साथ खुद के अन्दर पलती एक जद्दोजहद को भी प्रस्तुत करने का प्रयास है . ज़िन्दगी भर की कसमसाहट को मानो आवाज़ देने का प्रयास हो , एक घुन जो अन्दर ही अन्दर खा रही थी उससे कुछ निजात पाने की प्रक्रिया है सम्पूर्ण संग्रह . नहीं जानने के बाबजूद भी मेरा होता है और कभी कभी भरपूर जानने के बावजूद भी नहीं होता पहली कविता ये जो मेरापन है एक इन्सान को कहीं भीतर धकेलती है और उसकी आदिम पहचान से उसे मिलवाने की कवायद है . मैं और मेरा के चक्रव्यूह में घिरा मानव उम्र गुजार देता है मगर कभी इससे बाहर नहीं आ पाता क्योंकि स्वार्थ की गोटी चलते हुए हमेशा खुद को दांव पर लगाता रहा मगर नहीं जान पाया कि यहाँ यदि कुछ पाना है तो सबसे पहले खुद को जीतना होगा उसके बाद सारा जहान हमारा है , मुझसे इतर कुछ है ही नहीं , द्वि का पर्दा डाले उम्र गुजारता मानव सामाजिक सरोकारों से जुड़ता टूटता कभी नहीं जान पता अंतिम उद्देश्य और निष्कर्ष में बचती है तो सिफ आदिम प्यास जब तक कि अंतिम छोर पर पहुँचने से पहले न जान लिया जाए अपने होने को मैं और मेरे से परे भी और  मैं और मेरे के साथ भी बस वो ही है मेरापन .
दंतकथा जाने अपने अन्दर कितनी अनसुलझे रहस्यों को समेटे है फिर वो चाहे इतिहास से सम्बंधित क्यों न हों या फिर आज के सन्दर्भ में , एक ऐसे समय में जीते हम नहीं जान पाते उन रहस्यों को जो हमारी विरासत की नींव हैं , होकर उनसे लापरवाह मानव गढ़ना चाहता है नयी तस्वीर बिना जाने सत्यता के धरातल कि विकास और प्रगति की राहों पर चाहे जितना चलो नींव में जो इतिहास दबा है वो ही बना है कभी कमजोर व्यवस्था का उत्तरदायी तो कभी मजबूत व्यवस्था का पोषक . इतिहास से सबक लेकर ही निर्माण हो सकता है नयी सभ्यता का नहीं तो जिम्मेदार रहेंगे हम एक बार फिर उसी लिजलिजी सड़ी - गली व्यवस्था का .
दंतकथा के माध्यम से कवि ने मारक वार किया है फिर वो इतिहास हो वर्तमान या भविष्य . एक सुखद भविष्य के लिए जरूरी है इतिहास और वर्तमान से सबक लेकर भविष्य की नींव पुख्ता रखनी वर्ना कमजोर जबड़े कब तक रोक पायेंगे दांतों को गिरने से ये समझना बहुत जरूरी है . सारा ज्ञान कर्मों में समाप्त हो जाता है एक ऐसी सच्चाई जिससे मुख नहीं मोड़ा जा सकता . ज़िन्दगी में इंसान जो भी पढता है पूरा जीवन में उतार सके संभव नहीं हो पाता क्योंकि व्यवस्था ने हाथ पाँव इस तरह बाँध रखे हैं कि चाहकर भी उसके दुश्चक्र में फंसे बिना नहीं रहा जा सकता और यही आम मानव की त्रासदी है जिस पर कवि ने गहरा प्रहार किया है :
कि कोई चाहता था
मेरे जीवन को पढना
पर कितने ही हिज्जे गलत हो गए
जो लिखा उससे जीवन कुछ और बन गया
किसी को पढना था कुछ पढ़ कुछ और गया
कुछ खास नहीं करता हूँ
तब भी कई सरे उम्मीद भर नौउम्र चहरे मेरा इंतजार करते हैं
मैं वेतन लेता हूँ अमीरी रेखा का
और एक सरकारी कमरे में गरीबी रेखा को पढ़ाने जाता हूँ

अंतिम पंकियाँ व्यवस्था पर वो कटाक्ष हैं जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता क्योंकि यथार्थ का धरातल बहुत कठोर होता है और सिर्फ किताबी ज्ञान के सहारे ज़िन्दगी नहीं गुजरा करती है . जरूरी है बचपन से ही संस्कारों के बीजों का रोपण अन्यथा बड़े होने पर कौन सी फसल उगेगी कोई नहीं जानता . जीवन खतरे की घंटी बन जाता है जब बचपन को सही दिशा और संस्कार नहीं दिए जाते , गलत और सही का फर्क नहीं बताया जाता जिसे आने वाले कल को भुगतना पड़ता है . एक सीखनुमा कहानी के माध्यम से गहरी बात कहना ही कवि के लेखन का हुनर है जीवन में खतरा है भी एक जरूरी कथा है कविता :
 ज्ञानी थे ताऊ जी पर जाहिल निकला खूब पढ़ा लिखा भतीजा उनका
जो बेटे को शहर के सबसे बड़े स्कूल में भेजते हुए भी
उसके जीवन में कहीं पर
वो एक बेहद जरूरी खतरा है लगाना भूल गया है
स्त्री पुरुष सम्बन्ध हों या कविता उतार चढ़ाव अनिवार्य अंग होता है जीवन का मगर कवी हो या पुरुष उसकी दृष्टि सिर्फ सौन्दर्य पर ही रुकी रहती है या कहो वो सिर्फ स्व सुख या अपने हिसाब से गुनगुनाना चाहता है मगर कविता हो या स्त्री वो चाहती है पुरुष का सम्पूर्ण समर्पण . सम्पूर्णता ही तो जीवन का रिश्ते का सौन्दर्य होतीहै इस अर्थ को जानते हुए भी कवि हो या पुरुष खुद को उस स्टार तक चाहते हुए भी नहीं ला पाता फिर स्त्री हो या कविता कैसे पा सकती है सम्पूर्णता जिसे कवि ने बखूबी उकेरा है इन पंक्तियों में :
मैं उसे शास्त्रीय राग में निबद्ध किसी लम्बे ख्याल
तो कभी
ठुमरी और दादरा की तरह गाना चाहता हूँ
पर क्या करूँ एक लगभग कवि हूँ मैं
और वह समूची कविता
मुझे संगीत तो आता है
पर उसे स्वर देना नहीं आता
उसकी दूकान से कुछ आगे एक भव्य और भयानक शोरूम है
उसमे भी किताबें ही हैं
पर वह लिखे हुए से ज्यादा लिखनेवालों को बेचता है
सिर काट के शोकेस में सजाता है
धडों को सरकारी खरीद के मुर्दाघरों में भेजता है
एक ऐसा व्यंग्य जो आज का वो सत्य है जिससे कोई मुंह नहीं मोड़ सकता.आज साहित्य के बाज़ार की गलाकाट प्रतियोगिता में दो धडों के बीच मचते घमासान की मुखर अभिव्यक्ति है ये कविता- संतों घर में झगरा भारी ‘ . जो झगडा आज का नहीं है युगों से काबिज है दो वर्गों के बीच . एक स्वाभिमानी लेखक और एक पुरस्कारी बिकाऊ लेखक के बीच के अंतर को दर्शाती , बाजार संस्कृति किस तरह हावी हुई है उस पर दृष्टिपात करती हुई एक उद्घोषणा पर समाप्त होती है वक्त रहते संभलना जरूरी है कहीं दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली माल साफ़ न कर जाए समझना जरूरी है जिसे इन पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है :
और यह उजड़ना भी
कईयों के लिए एक रोचक दृश्यकाव्य है
अब तमाशबीनों में से ही कोई घर कब्ज़ा ले
सहज संभाव्य है
मानव जीवन के परिप्रेक्ष्य में एक खोज जो आदिकाल से चली आ रही है और अनंत तक जिसका विस्तार है . एक अधूरेपन के साथ जीना इंसानी विवशता जो चाहकर भी पूर्ण नहीं होता तब तक जब तक खुद को नहीं खोज लेता इंसान , अपना पता नहीं मिलता तब तक जीवन एक ऐसी असफल लम्बी कविता है जो हमेशा अधूरी ही रहती है को पूरी तरह परिभाषित किया है कवि ने कविता बुल्ला की जाणा मैं कौण जो निम्न पंक्तियों के माध्यम से उद्धृत किया गया है :
मैं कौन हूँ
कोई तो बताये
मैं हूँ एक लम्बी कविता अमर जिसकी असफलता
अजर जिसका अधूरापन
मानव मन की गहन अनुभूतियों का संगम है – ‘ हे पिता ‘ . एक बच्चे की अपने पिता से अपने होने न होने के सम्बन्ध में एक गुहार , एक संवाद मानो कवि कहना चाहता हो देखो कहाँ आ गया हूँ मैं , तुमने कहाँ भेजा था मुझे और क्या हो गया हूँ मैं मानो परम पिता परमात्मा से कवी संवाद कर रहा हो . यों एक पिता से भी समवाद के रूप में लिया जा सकता है कविता को . स्मृतियों का बीहड़ बहुत सघन है जहाँ कंटीली झाड़ियों से लहुलुहान है कवि की आत्मा और आखिरीहथियार के रूप में बची है कवि की वेदना संवाद रूप में .
गहन वेदना को प्रस्तुत करती कविता कवि मन की गहराइयों का वो संवाद है जिसका तीखापन कवि की कविता में स्वयमेव उभर आया है . जर्जर कविता एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन समाया है . एक नौकरीपेशा जीवन की त्रासदी जो स्वयं किसी कविता से कम नहीं यानी कविता दुःख दर्द तकलीफों का , पीड़ा और वेदना का चित्रण ही तो होती है और जीवन एक कविता सा ही तो गुजरता है . दोनों में फर्क करना जहाँ सम्भव नहीं रह पाता कि जीवन एक कविता है या कविता ही जीवन सी गुजर गयी . कविता जो स्वयं में ख़ुशी और गम का चित्रांकन होती है और जीवन भला उससे इतर कब होता है तो कैसे न जीवन को कविता का नाम न दे कवि ये है कवि की उच्च सोच जिसे वो यूं व्यक्त करता है :
जीवन नष्ट होता है इतना
कि उससे एक जर्जर कविता बन जाती है
जागना एक ऐसी क्रिया है जिसकी प्रतिक्रिया दूसरों के जागरण के साथ पूर्ण होती है . स्वयं का जागरण अन्तश्चेतना का जागरण ही मनुष्यता की पहली सीढ़ी है और जो इस राह के हमसफ़र हैं जो चाहते हैं बदलाव , जो रखते हैं कुछ कर सकने का जज्बा उनके जागरण पर ही संभव है देश समाज और दुनिया की एक नयी तस्वीर का गढ़ना बस जरूरत है तो सिर्फ इतनी जो आगे बढे उसकी टांग पकड़ कर खींचने की बजाये आगे बढ़ने में सहायक होना , साथी हाथ बढ़ाना एक अकेला थक जायेगा मिल कर बोझ उठाना की तर्ज पर अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही वास्तविक जागरण है , वहीँ स्वप्नों की दुनिया साकार हो सकती है और इसी का तर्जुमा है विनोद कुमार शुक्ल को याद करते हुए लिखी गयी कविता मुझे नींद नहीं आ रही जिसमे जीवन का सम्पूर्ण दर्शन समाया है , सोने और जागने के बीच में होते जागरण और कशमकश का एक ऐसा खाका खींचा है कवि  ने जो अन्तस्थ को कचोटने को काफी है जिसकी बानगी इन पंक्तियों में मुखरित होती है :
मेरे असंख्य पिटे हुए लोगों
अधिक कुछ नहीं मैं तुम्हारे साथ सुबह तक रहना चाहता हूँ
चाहता हूँ एक बहुत बड़ा वक्त है मेरे जीवन में
चाहता हूँ
कि मैं जब सुप्रभात कहूं तुम्हें
तुम शुभयात्रा कहना
अभी सुबह नहीं हो सकती नवम्बर २०१२ में दिल्ली की एक रात में लिखी गयी कवि द्वारा कविता नकारात्मकता पर सकारात्मकता का संबल कवी है जीने के लिए मानो इस मूलमंत्र का जाप करती हो . एक नकारात्मक समय में जीते हम चाहे किसी भी हद तक नकारात्मक हों मगर एक सकारात्मकता हमारे अन्दर हमेशा पलती है कि अंत में सब ठीक हो जायेगा इसलिए नहीं होती स्वीकार्य ऐसी नकारात्मकता जो जीने को ही प्रश्नचिन्ह बना दे . उम्मीद की किरण काफी होती  है अँधेरे चराग जलाने को इसी का पालन करता कवि अभी उम्मीद का दामन थामे है जो एक कवि की कविता की अंतिम पहचान होता है . कवि का धर्म है उम्मीद  जन्म देना , हौसलों को उड़ान देना जिसका पालन अक्षरक्ष: कवि ने कविता में  किया है . सकारात्मक पहलू ही कविता का सौन्दर्यबोध है . गोपनीय मानो ये शब्द लिख कवी अपने जीवन भर की भड़ास निकालता है . मानो एक बंधी बंधाई लकीर पर चलने की मजबूरी से निजात पाने का अंतिम विकल्प है कविता के माध्यम से सारा विष वामन कर खुद से नज़र मिलाने लायक महसूसना , कुछ राहत की सांस लेना , कुछ खुद से ईमानदार होने को पुरस्कृत करना .......... बस यही है कवि के लेखन का उपक्रम जो एक वक्त पर आकर जरूरी हो जाता है , हर गोपनीयता को उल्लखित कर देना ही अंतिम विकल्प है खुद से नज़र मिलाने का और यही है ज़िन्दगी का हासिल जब आप खुद से नज़र मिला सको , मुस्कुरा सको इन पंक्तियों में उल्लेखित है कवि उद्घोषणा जो स्वयं से करता है :
और ऐसा करते हुए मैं छुपता नहीं
बचपन के हारे हुए खेल की तरह भरपूर दिखता हूँ
जहाँ जहाँ लिख सकता हूँ इस गोपनीयता की ऐसी तैसी लिखता हूँ
हम हार नहीं रहे हैं राजनीति, आतंकवाद आदि पर प्रहार करती रचना मनुष्य  की जिजीविषा से ओत प्रोत है . आज के समय का सटीक चित्रण है फिर चाहे कितना प्रहार होते रहे बाकी है अभी इंसान में जीने जा जज्बा हर हाल में वो ही उसका सबसे बड़ा हथियार है . हम चुनाव में हैं आज की राजनीति का सत्य है कैसे एक सही कहने और करने  वाले इंसान का नामोनिशान मिटा देने के कवायद शुरू होती है और सत्ता रुपी  वेश्या को भोगने को शुरू हो जाती है दलालों में दलाली , कुर्सी का मोह छीन लेता  है हर आचार विचार और संहिता और पटक दिया जाता है आम आदमी हाशिये पर कहते हुए
ये किस जंगल से आया है यहाँ सब सुसभ्य इन्सान काम करते हैं
और जंगल के कानून यहाँ नहीं चलते हैं फिर एक अकेला कैसे कर सकता है
आमूलचूल परिवर्तन जहाँ हमाम में सभी नंगे हों . खेत में घर इंसानी लालच की पराकाष्ठा का वो चित्रण है जिससे आज कोई अनजान नहीं . वहीँ रेल की पटरियां कविता लिखने से पहले की मनः स्थिति का चित्रण है अवसाद क्रोध और बेबसी के बीच कविता का कैसे जन्म होता है उसका चित्रण किया है रेल की पटरियों के माध्यम से जीवन में आये उतार चढ़ाव और दृश्यावलियाँ बनती है कविता का खाद पानी . अंत में कवी नीलेश रघुवंशी के प्रति आभार प्रकट करते हुए एक कसबे के नए नोट्स के माध्यम से कैसे शराब जीवन बर्बाद कर रही है और कैसे सरकार सब कुछ जानते हुए भी आँखें मूंदें बैठी है न केवल उसका चित्रण है बल्कि ये सब देख एक कवी ह्रदय किस तरह पीड़ा हताशा और क्रोध से व्यथित होकर अपनी वेदना को शब्दबद्ध करता है मानो शिव बन विषपान कर रहा हो कुछ न कर पाने की मजबूरी में .बेरोजगारी , प्रेम में असफलता और पागलपन के बिम्ब सहजता से सम्पूर्ण दृश्य को रेखांकित कर देते हैं कि कैसे थोड़े से फायदे के लिए युवाशक्ति के जीवन से खेला जाता है और इसी के साथ जीना इंसानी मजबूरी है और जब वेदना आसमां का सीना फाड़ने में अक्षम हो जाती है तब कविता के रूप में  प्रस्फुटित होती है कुछ इस तरह :
कि मेरा कवि अंततः मनुष्यता के दुर्दिनों का कवि है
जो अपनी पीड़ा, प्रेम और क्रोध के सहारे जीता है
शराब पीनी छोड़ दी है जिसने कभी की
अब बस अपने भीतर का अब्रो आब पीता है
संग्रह की सभी कवितायेँ मानव मन की पीड़ा का ही विएचन करती हैं इसलिए सम्पूर्ण संग्रह जीवन की बेजारी का वो नक्शा है जिसे ज़िन्दगी के मानचित्र पर सिर्फ एक कवि ही उकेर सकता है वर्ना ऐसे दृश्यों के लिए नहीं बनाए जाते  स्मारक नहीं होतीं जगहें चिन्हित और कवि सक्षम है अपने मन के भावों को शब्दबद्ध करने में और यही कवि के लेखन की सफलता है जहाँ उसकी निगाह  समाज में फैली विद्रूपताओं और विसंगतियों पर न केवल पड़ती है बल्कि उन पर प्रहार भी करती है केवल कह देना भर नहीं है कवि का लक्ष्य बल्कि निजात पाने को अन्दर की आग को जगाने को भी काफी हैं कवितायें जो कविता का आवश्यक अंग गिना जाता है जिसे कहने में कवि की लेखनी सक्षम है .

Saturday, 14 November 2015

पागल मन फिर बुन रहा सपनों का संसार

सामान्य से सामान्य लोग चाहे वो अमीर हो या गरीब, शहरी हो या देहाती, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, सभी को कुछ याद हो या न हो कबीर के दोहे जरूर याद होंगे. ये दोहे आज भी समाज में बड़े पैमाने पर बोले और गाए जाते हैं और भविष्य में भी गाए जाते रहेंगे.
पिछले कुछ दशकों से हिंदी साहित्य में विभिन्न विधाओं में दोहे पर बहुत कम कार्य हुआ है. लेकिन गोविन्द सेन  ने अपनी नवीन पुस्तक ‘खोलो मन के द्वार’  के माध्यम से नए विचार, बोध, शिल्प, भाषा, बिम्ब, प्रतिबिम्ब, नई शैली और नए सौन्दर्यबोध का विकास किया है. 

भारत में अधिकांश बच्चे पढ़ने, खेलने की उम्र में मेहनत मजदूरी करने को मजबूर हैं या उनका बचपन किसी न किसी बोझ से दबा हुआ है. भारत का भविष्य रोता, बिलखता बचपन न जाने कितनी ही विसंगतियों, विकृतियों सीमाओं के कारण अपनी प्राकृतिक मुस्कान खो बैठा है. लेखक इस चुप्पी, बेचैनी, उदासियों को दूर करने का आवाहन करता है-
बौने हैं सभी बौने हैं भगवान
दुनिया में सबसे बड़ी बचपन की मुस्कान
झरने, नदिया, घाटियाँ, हरियाली के धान
मुक्त हस्त से बाटिये फूल, हंसी और मुस्कान

गोविन्द सेन ने आधुनिक सरकार की नब्ज को बहुत ही गहराई से पकड़ कर उसको तार-तार किया है. सत्ता चाहे किसी की भी हो, जनता हमेशा पिसती है और उसके नेता सत्ता की मद में चूर होते हैं-
सत्ता सुन्दर है बड़ी सत्ता है मगरूर
सत्ता पा होते सभी इसकी मद में चूर
सत्ता अब करने लगी, हत्यारों से प्रीत, 
आजकल भय भी है भयभीत

दूसरी तरफ सत्ताधारियों को भी ललकारा है-
रे मूरख! भूल मत सत्ता के दिन चार
सच है अपना झोपड़ा भ्रम राजदरबार

भारतीय नेताओं ने रंग-ढंग, चाल-चलन सब नये जमाने के अनुसार हो गए हैं. राजनीति अब सेवा नहीं मेवा है जिसे लूटने के लिए शरीफ लोगों की नहीं, दुर्जन व्यक्तियों की आवश्यकता होती है-
भीतर बाहर हर तरफ मची हुए है लूट
लोकतंत्र देने लगा दुर्जन को हर छूट
पैसा उनका ज्ञान है पैसा उनका धर्म
लज्ज्ति होते नहीं करके काले कर्म

लेखक ने पाठकों को उन लोगों की पहचान कराने की कोशिश की है जो थोड़ा सा कार्य करके देशहित में न्योछावर बताकर अमर हो जाने की कोशिश में लगे रहते हैं.
छोटी सी ऊँगली कटा बनते हैं शहीद
ऐसे लोगों से हमे नहीं उम्मीद   
इसीलिए लेखक पाठकों को आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी प्रदान करने की कोशिश करता है-
      दृष्टिहीन करने लगे दृष्टियों का उल्लेख
आँखे अपनी खोल कर देख सके तो देख
सत्ताधारी, नेता लोभी व मुनाफा खोर मनुष्य को चारो तरफ से लूटने के लिए हर समय अपना नया पैंतरा और नया तरीका इजाद कर रहा है. लेखक गोविन्द सेन ने अपनी संवेदना और लोक दृष्टि से पाठक की चेतना को विकसित करने में सफल कोशिश की है-
अच्छा मौका देख कर देगी आघात...
नये दौर की मकड़िया ऐसी चलती चाल
नित्य नई तकनीक से बुनती हैं वे जाल
लेखक सिर्फ उदासियों की वाहवाही बयानगी मात्र नहीं करता बल्कि उत्पीडन और बेदिली अदब के दौर में भी लेखक ने हार नहीं मानी-
      पत्थर दिल इंसान ने तोड़े स्वप्न हजार
      पागल मन फिर बुन सपनों का संसार
      चाहे कितना काटिये बढ़ जाते हर बार
      नाखूनों ने आज तक कब मानी है हार
सत्ता का रंग बदलते ही सबसे पहले सत्ता सुख वाली मीडिया का रुख बदल जाता है. मीडिया सत्ता के रंग में पागल हाथी की तरह मदमस्त होकर जनता की भावनाओं को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है. लेखक उनके मुनाफे की हवस को नंगा करता है-
      बेच रहे हैं सनसनी सारे चैनल आज
      तेज मसाला डालते भूरे धोखेबाज ...
      रफू किया है इस तरह गायब हैं अब छेद
      पकड़ न पायेगी आँख कभी छेद का भेद
वादे हैं वादों का क्या. सत्ता वादा करती है और मुकर जाती है. मनुष्य फिर वही भगवान के  दर पर चला जाता है जहाँ वह पहले भी लुटता आया है. लेखक बड़े ही साहस के साथ अपने समय और भगवान को चुनौती देता है-
      कठिन दिनों से नित्य ही जूझ रहा इंसान
      अच्छे दिन आखिर कहाँ भटके हैं भगवान
      मंदिर-मस्जिद से जरा बाहर आ भगवान
      गाजर मूली की तरह कटे यहाँ इंसान
लेखक को अपना पक्ष चुनना पड़ता है इसीलिए अन्य लेखकों को भी गोविन्द सेन कुछ आग्रह करते दिखाई देते हैं-
      धनपतियों की शान में लिखे आपने लेख
      धनहीनों की जिन्दगी अँधियारा भी देख
गोविन्द सेन हमारे दौर के ऐसे लेखक हैं जिन्होंने रहीम, बिहारी, रसखान, कबीर इत्यादि की परम्परा को आगे बढ़ाने का सतत एवं सजग प्रयास किया है. उनके दोहे भाव, भाषा, बिम्ब एवं शैली नवीनता का अहसास कराती है. नव सृजन को एक नई पहचान दिलाने की अपनी यात्रा को जारी रखती है.




समीक्षक : एम.एम.चन्द्रा
खोलो मन के द्वार : गोविन्द सेन | प्रकाशक : बोधि प्रकाशन | कीमत 60 रुपये



Friday, 13 November 2015

क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती



क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती डॉ. शिखा कौशिक ‘नूतन’ द्वारा लिखा गया लघु कथा संग्रह है जिसमें स्त्री और पुरुष की गैर बराबरी के विभिन्न पहलुओं को छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से सशक्त रूप में उजागर किया है. इस संग्रह में हमारे समाज की सामंती सोच को बहुत ही सरल और सहज ढंग से प्रस्तुत किया है, खासकर महिला विमर्श के बहाने समाज में उनके प्रति सोच व दोयम दर्जे की स्थिति को बहुत ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है. फिर मामला चाहे अस्तित्व का हो या अस्मिता का ही क्यों न हो.
लेखिका डॉ. शिखा कौशिक ‘नूतन’ अपनी कथाओं के जरिये बताती हैं कि बेशक आज देश उन्नति के शिखरों को चूम रहा हो लेकिन असल में लोगों की सोच अभी भी पिछड़ी, दकियानूसी और सामंती है. इसी सोच का नतीजा है कि हमारे समाज में आज भी महिलाओं को हमेशा कमतर समझा जाता है. किसी भी किस्म की दुश्मनी का बदला औरत जात को अपनी हवस का शिकार बनाकर ही किया जाता है, फिर मामला चाहे सांप्रदायिक हो या जातिगत -“जिज्जी बाहर निकाल उस मुसलमानी को!! ...हरामजादों ने मेरी बहन की अस्मत रौंद डाली...मैं भी नहीं छोडूंगा इसको...!!!
लेखिका ने समान रूप से काम करने वाले बेटे-बेटी के बीच दोहरे व्यवहार को बखूबी दर्शाया है जो अक्सर ही हमारे परिवारों में देखने, सुनने या महसूस करने को मिल जाता है- “इतनी देर कहाँ हो गयी बेटा? एक फोन तो कर देते! तबियत तो ठीक है ना ? बेटा झुंझलाकर बोला- ओफ्फो... आप भी ना पापा... अब मैं जवान हो गया हूँ... बस ऐसे ही देर हो गयी. पिता ठहाका लगाकर हंस पड़े. अगले दिन बेटी को घर लौटने में देर हुई तो पिता का दिमाग सातवें आसमान पर पहुँच गया. बेटी के घर में घुसते ही पूछा ...घड़ी में टाइम देखा है! किसके साथ लौटी हो?...पापा वो ऐसे ही. बेटी के ये कहते ही उलके गाल पर पिता ने जोरदार तमाचा जड़ दिया.”
डॉ. शिखा ने भारतीय समाज में व्याप्त लिंगीय भेदभाव पर बहुत ही तीखा प्रहार किया है और उन मिथकों को तोड़ने की भरसक कोशिश की है जो एक स्त्री होने की वजह से हर दिन झेलती है. लेखिका इस बात पर शुरू से लेकर अंत तक अडिग है कि औरत ही औरत की दुशमन नहीं होती बल्कि सामाजिक तथा आर्थिक सरंचना से महिलायें सामन्ती एवं पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित हो जाती हैं - “ऐ... अदिति... कहाँ चली तू? ढंग से चला फिरा कर... बारवें साल में लग चुकी है तू... ये ढंग रहे तो तुझे ब्याहना मुश्किल हो जायेगा. कूदने-फादने की उम्र नहीं है तेरी. दादी के टोकते ही अदिति उदास होकर अंदर चली गयी. तभी अदिति की मम्मी उसके भाई सोनू के साथ बाजार से शोपिंग कर लौट आयीं. सोनू ने आते ही कांच का गिलास उठाया और हवा उछालने लगा. ...गिलास फर्श पर गिरा और चकनाचूर हो गया. सोनू पर नाराज होती हुई उसकी मम्मी बोली- “कितना बड़ा हो गया है अक्ल नहीं आई! ...अरे चुपकर बहु एक ही बेटा तो जना है तूने ...उसकी कदर कर लिया कर... अभी सत्रहवें ही में तो लगा है... खेलने-कूदने के दिन हैं इसके...”
प्रेम करना आज भी एक गुनाह है. अगर किसी लड़की ने अपनी मर्जी से अपना जीवन साथी चुना तो परिवार व समाज उसके इस फैंसले को कतई मंजूरी नहीं देते बल्कि इज्जत और मर्यादा के नाम पर उसको मौत के घाट उतार दिया जाता है. प्रेम के प्रति लोगों की सोच को नूतन कुछ इस तरह व्यक्त करती हैं- “याद रख स्नेहा जो भाई तेरी इज्जत की बचाने के लिए किसी की जान ले सकता है वो परिवार की इज्जत बचाने की लिए तेरी जान ले सकता है. ...स्नेहा कुछ बोलती इससे पहले ही आदित्य रिवाल्वर का ट्रिगर दबा चुका था.”
हमारे समाज में आज भी लोगों के मन में जातिवाद घर बनाये हुए है. जातिवाद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने आ ही जाता है. स्कूल, कॉलेज, नौकरी-पेशा, शादी-विवाह या किसी भी कार्यक्रम के आयोजन ही क्यों न हो जाति कभी पीछा नहीं छोडती- “जातिवाद भारतीय समाज के लिए जहर है. इस विषय के संगोष्ठी के आयोजक महोदय ने अपने कार्यकर्ताओं को पास बुलाया और निर्देश देते हुए बोले- देख! वो सफाई वाला है ना. अरे वो चूड़ा. उससे धर्मशाला की सफाई ठीक से करवा लेना. वो चमार का लौंडा मिले. ...उससे कहना जेनरेटर की व्यवस्था ठीक-ठाक कर दे. बामन, बनियों, सुनारों, छिप्पियों इन सबके साइन तू करवा लियो... ठाकुर और जैन साहब से कहियो कुर्सियों का इंतजाम करने को.”
किसी भी स्त्री और पुरुष की ताकत, हुनर, पहलकदमी, तरक्की को देखने का नजरिया एकदम अलग-अलग होता है. लेकिन  स्त्री जाति के विषय में बात एकदम अलग है क्योंकि किसी भी स्त्री को डर, धमकी या मार द्वारा उसके लक्ष्य से कोई भी डिगा नहीं सकता. सिर्फ पुरुषवादी सोच ही स्त्री को चरित्रहीन कहकर ही उसको अपमानित करती है. “रिया ने उत्साही स्वर में कहा जनाब मुझे भी प्रोमोशन मिल गया है. ‘अमर’ हाँ, भाई क्यों न होता तुम्हारा प्रोमोशन, तुम खूबसूरत ही इतनी हो.”
डॉ. शिखा कौशिक ने लगभग 117 लघु कथाओं की शिल्प शैली लघु जरूर है लेकिन उनकी विचार यात्रा बहुत ही गहरी और विस्तृत है. लेखिका ने ग्रामीण परिवेश और उसकी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना में रची बसी विकृतियों, समस्याओं और जटिलताओं को पाठकों तक पहुँचाने का काम करके स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं को चिन्हित किया है.

 समीक्षक- आरिफा एविस

क्योंकि औरत कट्टर नहीं होती : डॉ.शिखा कौशिक ‘नूतन’ |

अंजुमन प्रकाशन | कीमत :120 

Monday, 2 November 2015

अपने समय की संवेदनशील अभिव्यक्ति : किनारे की चट्टान


नई कविता के भविष्य के विषय में सुनकर मन जितना आशंकित है, उससे कहीं ज्यादा यह उम्मीद बंधाता है कि मनुष्यता को बचाने के लिए कविता अपना कार्य हमेशा करती रही है और आगे भी करती रहेगी. शायद किसी ने ठीक ही कहा है कि मनुष्यता को बचाने की आखिरी उम्मीद कविता है. इसी परम्परा के कवि  पवन चौहान का प्रथम काव्य संग्रह ‘किनारे की चट्टान’ उन उम्मीदों को जिन्दा रखने की लिए याद किया जाएगा.

कविता कहाँ जन्म लेती है? कैसे जन्म लेती है? क्यों जन्म लेती है? यहाँ तक कि किसके लिए जन्म लेती है? जैसे प्रश्नों का जवाब देने की कोशिश पवन चौहान की कवितायें करती हैं, जो गाँव, पहाड़, जंगल, मनुष्य, उसके सपने और अपने समयकाल की संवेदनशील अभिव्यक्ति को कलमबद्ध करती है. लेखक चाहे किसी भी दौर में, किसी भी ठिकाने, किसी भी किनारे पर बैठा हो उसकी नजरों से कुछ नहीं बच सकता–
      किनारे पर बैठा कवि देखता है सब
      लहरों का उन्माद... चट्टान की सहनशीलता
      समुद्र से टकराने का हौंसला
      उसकी दृढ़ता, आत्मविश्वास
      वह भी होना चाहता है चट्टान
      किनारे वाली चट्टान
कवि का कर्म बस लिखना है. कवि कविता के लिए, कला कला के लिए होनी चाहिए. लेकिन पवन चौहान इस दार्शनिक उक्ति को चुनौती देते हैं. वे अपने अंतर्मन को धिक्कारते हैं, अपने को समय को झंकझोरते हैं, अपनी कविताओं से, अपने शब्दों से यहाँ तक कि अपने आप से निरंतर संघर्ष करते हैं और अपनी स्वतंत्र कल्पनाओं को परवाज देते हैं.
      मुझे नहीं पड़े रहना है
      किसी अँधेरे कोने में अनजान सा...
      नहीं जीना है मुझे
      कागज के बंद लिफाफों के अंदर
      घुट-घुट कर
      नहीं जकड़े रहना है मुझे
      निर्बल रूढियों में
      बस ! बहुत हुआ
      अब मुझे स्वतंत्रता चाहिए
      घूँघट से झांकते अनगिनत चेहरों से...
      स्थिर जल में गिरती बूँद की तरह
      अब मैं फैलाव चाहता हूँ
लेखक ने प्रेम प्रवाह की धारा को समयकाल परीस्थितियों में  कभी कम नहीं होने दिया. लेखक किसी एक से प्रेम नहीं करता बल्कि उन सभी से प्रेम करता है जिनसे उसका तनिक भी नाता है. वह जितना प्रेम अपने पिता, बेटी, माँ से करता है, उनता ही प्रेम वह चिम्मू (शहतूत के पेड़) से करता है-
      आज तोड़ रहा हूँ दोनों पेड़ों के पक्के चिम्मू
      और सम्भाल कर रख रहा हूँ उन्हें
      छोटे सी गत्ते की पेटी में...
      भिजवाऊगा बेटी को रंग-बिरंगे चिम्मू
      ढेर सारा प्यार
लेखक अपनी कविताओं से बड़ा बनता है, और कविता बड़ी बनती है उसकी गहराई और विस्तार से. ‘सेब का पेड़’ कविता जिस पीड़ा को चिन्हित करती है. वह केवल उस अकेली माँ की पीड़ा नहीं वरन उन सभी माँ-बाप की पीड़ा है जिनके बच्चे विदेशों में जाकर बस गए हैं और माँ-बाप उनके इन्तजार में मर जाते हैं -
      बेटे के विदेश में बसने के बाद
      रखती रही वह इसके फल सहेजकर
      हर वर्ष
एक आस लगाये
      वह आएगा इस वर्ष
      जरूर लौटेगा वह
      ममता की छाँव तले
मनुष्य से मनुष्यता तक, संकुचित विचारों से समृद्ध विचारों तक, न्यूनतम से उच्चतम
तक, जमीन से आसमान तक, पहाड़ों से पठार तक की यात्रा में परिपक्वता की आवश्यकता होती है. परिपक्वता चाहे किसी भी क्षेत्र की हो, उसके अनुभव का अपना महत्व है जिसे लेखक सहजता से स्वीकार करता है-
      अभी सीख नहीं पाया मैं
      कच्ची मिट्टी से पक्के बर्तन बनाना...
      खोजना होगा उन अनगिनत रास्तों में से एक ...
      जोड़ने होंगे नये शब्द रचना में...
      तभी दे पाऊंगा मैं रूप मृतिका को
जब कभी भी समाज में तानाशाही जन्म लेती है तो जैसे प्रतिरोध की संस्कृति खत्म सी होने लगती है. तानाशाही का गुणगान होने लगता है. चारो तरफ ख़ामोशी, अंधकार एक खास तरह की चुप्पी देखने को मिलती है. लेकिन इतिहास गवाह है, तानाशाह के साथ स्वतंत्र चिन्तन, नई कल्पनायें, संभावनाएं जन्म लेती हैं. इसीलिए लेखक को यकीन है-
      फूटेगी कल्पना की नन्हीं-सी कोंपल
      और जन्म होगा किसी नये सृजन का
      शायद तभी ढीली हो पायेगी
      शहनशाह की मजबूत बेड़ियों की जकडन
      और मिल पायेगी
      इस खामोश लम्बे रास्ते में
      बोलती कोई पगडण्डी
जीवन चारों दिशाओं में फैला हुआ है, लेखक को सौन्दर्यबोध देखना आना चाहिए. लेखक पवन चौहान पहाड़ी जीवन के सौन्दर्यबोध को, उसकी जीवंत जिजीविषा को अपनी लेखनी से और भी अधिक जीवंत बना देता है-
      नीलू की माँ खुश है
      इस बार भर गया है जंगल
      काफल के दानों से
हर पेड़ हो गया सुर्ख लाल
इस बार खूब होगी आमदनी
जुटा लेगी वह इस बार
अपनी जरूरत का हर सामान
वैश्विकरण की बयार ने पहाडी विस्थापन और शोषण को और अधिक बढ़ा दिया है जिसका दर्द चारो दिशाओ में फ़ैल रहा है. कुछ लोग इस विस्थापन से बहुत नाम कमा रहे हैं लेकिन पहाड़ का जीवन वैसा का वैसा ही बना हुआ है. इसीलिए लेखक ने पहाड़ी जीवन की चर्चा कर नाम कमाने वालों को भी धिक्कारा है-
      घर में बैठ
      पहाड़ पर चर्चा करने वालों...
      उस वक्त डरे, सहमे, बेबस
      दर्द से सराबोर
      शिथिल, बौने से हो जाते हैं
      तुम्हारे शब्द
      और दम तोड़ते नजर आते हैं
      उस पहाड़ की तरह
      जो काट लिया जाता है
      कुछ स्वार्थों के लिए
     
पवन चौहान एक तरफ पहाड़ी जीवन दर्शन का सौंदर्यबोध अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हैं. वहीं आधुनिक शहरी जीवन की बेबसी, कुंठा, हताशा, निराशा और भागमभाग जीवन शैली का भी उतना ही सटीक एवं यथार्थ वर्णन करते हुए शहरी मानसिकता में आ रहे बदलावों को गहरी दृष्टि से देखते हैं - 
      स्वार्थ की कसौटी पर डोलते रिश्ते  
      बिकते सपने, मरते सपने..
      चारो तरफ फैली हुई
      भावनाओं, आकांक्षाओं की इंसानियत की लाशें
      उन्हें रौंदते हुए अनगिनत कदम...
      दफन होती असंख्य चीखें...
      सनसनाती तलवारे, दनदनाती गोलियां
      आ जाओ तुम भी पगडंडी छोड़
      खुली सड़कों पर
      मैं विश्वास दिलाता हूँ
      देर नहीं लगेगी तुम्हे बनने में शहरी
      मेरी तरह
जहाँ जीवन है, वहाँ उम्मीद है. जहाँ उम्मीद है, वहाँ सपने है. जहाँ सपने हैं, वहाँ उन सपनों को पाने की जद्दोजहद है. जहाँ जद्दोजहद है, वहाँ उन सपनों, कल्पनाओं, आकांक्षाओं को जमीन पर लाने की उम्मीद अभी बाकी है.
      सोच को मिलेगी परवाज कभी
      उम्मीद है ...
      कदम नापेंगे नये विस्तृत रास्ते
      शब्द स्वतंत्र होंगे और कानों में गूंजेगी
      एक नई प्यारी मीठी-सी धुन
पवन चौहान की कविताएँ पहाड़ का दर्द ही बयान नहीं करती बल्कि यकीन, उम्मीद और नई सुबह लाने की अपनी आकांक्षाओं को पाठक के सामने लाती है . लेखक व उसकी कविता अपना पक्ष चुनती है, जनता का पक्ष, नई सुबह का पक्ष, उजाले का पक्ष, नई सम्भावनाओं का पक्ष.

समीक्षक : एम.एम.चन्द्रा 

किनारे की चट्टान : पवन चौहान | बोधि प्रकाशन | कीमत 70 रुपये |